पारिस्थितिकी और मानव हृदय

बौद्ध धर्म की शिक्षा के अनुसार प्राकृतिक पर्यावरण और उसमें रहनेवाले सचेतन लोगों के बीच अत्यधिक परस्पर निर्भरता है। मेरे कुछ मित्रों ने मुझे बताया कि मानव का मूल स्वभाव कुछ-कुछ हिंसक है, पर मैंने उनसे कहा कि मैं इस विचार से असहमत हूँ। उदाहरण के लिए यदि हम विभिन्न प्राणियों का अध्ययन करें तो पाएँगे कि बाघ या शेर जैसे प्राणियों का जीवन दूसरों की जीवन को समाप्त करने पर निर्भर है। बाघ या शेर को प्रकृति की ओर से ही तीक्ष्ण और नुकीले दांत तथा नख मिले हैं। हिरण जैसे शांत और पूरी तरह शाकाहारी पशुओं के दांत छोटे होते हैं और नख भी। इस मापदंड के आधार पर देखा जाए तो मानव की मूल प्रवृत्ति अहिंसक है। जहाँ तक मानव का अस्तित्व बनाए रखने का प्रश्न है, तो मानव एक सामाजिक जीव है। हमें अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए मित्र की आवश्यकता होती है। यह प्रकृति का नियम है कि यदि मानव को दूसरे मानव का साथ ना मिले तो उसका अधिक दिन तक जीवित रहना कठिन ही होता है।

मेरा पूर्ण विश्वास है कि मानव की मूल प्रवृत्ति अहिंसक है। मैं समझता हूँ कि हमें न केवल दूसरे व्यक्तियों के साथ शांति और सौहार्द्र का व्यवहार करना चाहिए, अपितु प्राकृतिक पर्यावरण के साथ भी हमें ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए। नैतिकता की बात की जाए तो हमें अपने समूचे पर्यावरण को लेकर सजग होना चाहिए।

यहाँ एक दूसरा दृष्टिकोण है, जहाँ प्रश्न केवल आचरण का ही नहीं, अपितु हमारे अपने अस्तित्व का भी है। पर्यावरण न केवल इस पीढ़ी, बल्कि भावी पीढ़ियों की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यदि हम पर्यावरण के शोषण में अति करेंगे तो हो सकता है कि हमें वर्तमान में कुछ आर्थिक या अन्य लाभ मिल जाए, लेकिन भविष्य में यह न केवल हमारे लिए, अपितु हमारी भावी पीढ़ी के लिए भी हानिकारक होगा। जब पर्यावरण परिवर्तित होता है तो मौसम तंत्र ही बदल जाता है। जब इसमें नाटकीय परिवर्तन होता है तो अर्थव्यवस्था के साथ-साथ कई परिवर्तन होते हैं। यहाँ तक कि इसका प्रभाव हमारे शारीरिक स्वास्थ्य पर भी नाटकीय ढंग से पड़ता है। इसलिए यहाँ प्रश्न केवल नैतिकता का नहीं है, बल्कि हमारे अस्तित्व का भी है।

इसलिए प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण में सफलता के लिए मेरे विचार में यह महत्त्वपूर्ण है कि सबसे पहले हम मनुष्यों के बीच ही एक आंतरिक संतुलन स्थापित करें। पर्यावरण के प्रति दुर्व्यवहार जिससे मानव समुदाय की इतनी हानि हुई है, पर्यावरण के महत्त्व के प्रति अनभिज्ञता के कारण। मेरे विचार से लोगों को इस बात को समझाना आवश्यक है। हमें लोगों को यह समझाना होगा कि पर्यावरण का सीधा प्रभाव हमारे अपने हितों पर पड़ता है।

मैं सदा करुणापूर्ण विचारों के महत्त्व की बात करता हूँ। जैसा कि मैंने पहले भी कहा, कि आपके अपने स्वार्थ की दृष्टि से भी देखा जाए तो आपको दूसरे लोगों की आवश्यकता होती है। यदि आप दूसरे लोगों के कल्याण को लेकर चिंतित हों, दूसरों की पीड़ा बाँटें और उनकी सहायता करें तो अंततः आपका ही लाभ होगा। यदि आप केवल अपने बारे में ही सोचें और दूसरों को भूल जाएँ तो अंत में आप की ही हानि होगी। यह भी एक प्रकार से प्रकृति के नियम जैसा ही है।

यह अत्यधिक सरल है। यदि आप लोगों को देखकर मुस्कुराते नहीं बल्कि भौहें चढ़ाते हैं तो उनकी प्रतिक्रिया भी वैसी ही होती है, है कि नहीं?  यदि आप दूसरे लोगों के साथ सच्चा और खुलकर व्यवहार करते हैं तो वे भी आपके साथ उसी प्रकार का व्यवहार करते हैं। सभी मित्र चाहते हैं, कोई शत्रु नहीं चाहता। मित्र बनाने का उचित ढंग है सहृदयता ना कि केवल धन या सत्ता। सत्ता के मित्र और धन के मित्र कुछ अलग ही प्रकार के होते हैं। ये सच्चे मित्र नहीं। सच्चे मित्रों को हृदय से सच्चा मित्र होना चाहिए, है ना? मैं हमेशा लोगों को बताता रहता हूँ कि वे मित्र जो आपके पास उस समय आते हैं जब आपके पास सत्ता और धन हो तो वे वास्तव में आपके सच्चे मित्र नहीं हैं, अपितु सत्ता और धन के मित्र हैं, क्योंकि जैसे ही सत्ता या धन न रहेगा तो वे मित्र भी साथ छोड़ने के लिए तैयार होंगे। वे विश्वासपात्र नहीं हैं।

सच्चे मानवीय मित्र सदा आपके साथ होते हैं फिर चाहे आप असफल हों या अथवा आपका भाग्य बुरा हो, वे सदा आपके दुःख और बोझ को बाँटेंगे। इस प्रकार के मित्र क्रोधित होकर नहीं बनाए जा सकते और न ही अच्छी शिक्षा या बुद्धि से, बल्कि सहृदयता से। यदि और गहराई से सोचा जाए तो यदि आपको स्वार्थी बनना ही है तो बुद्धिमानी के साथ स्वार्थी बनिए न कि संकीर्ण दृष्टि वाले स्वार्थी। मुख्य बात है सार्वभौमिक उत्तरदायित्व की भावना – वही सच्ची शक्ति का स्रोत है, सच्चे सुख का स्रोत। यदि हमारी पीढ़ी हर उपलब्ध संसाधन-पेड़, पानी, खनिज पदार्थों का शोषण अगली पीढ़ी अथवा भविष्य की चिंता किए बिना ही कर देगी तो यह हमारी दोष होगी,  है या नहीं?  पर यदि हममें सच्ची सार्वभौमिक उत्तरदायित्व की भावना एक केन्द्रीय प्रेरणा के रूप में होगी तो हमारे और पर्यावरण के संबंध संतुलित होंगे। एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न है कि चेतना क्या है, या चित्त क्या है? पश्चिमी विश्व में पिछले एक या दो सदियों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर काफी जोर रहा है, जिसका सीधा संबंध पदार्थ से है। आज कुछ परमाणु भौतिकविदों और स्नायुविशेषज्ञों का कहना है कि जब आप किसी भी कण का विस्तार से विश्लेषण करते हैं तो इसमें निरीक्षक की ओर से भी कुछ प्रभाव पड़ता है, ज्ञाता का। यह ज्ञाता क्या है? एक सरल सा जवाब है-एक मानव, एक वैज्ञानिक। वैज्ञानिक किस प्रकार से जानता है? मस्तिष्क से। पश्चिमी वैज्ञानिक अब तक केवल सैकड़ों की ही पहचान कर सके हैं। अब आप इसे जो चाहें कह लें मन, मस्तिष्क या फिर चेतना, मस्तिष्क और मन के बीच एक संबंध है और साथ ही मस्तिष्क और पदार्थ के बीच। मेरे विचार से यह महत्त्वपूर्ण है। मुझे लगता है कि पूर्व के दर्शन और पश्चिम के विज्ञान के बीच इस संबंध के आधार पर एक प्रकार के संवाद करने की संभावना है।

जो भी हो आज हम मानव बाहरी विश्व को लेकर बहुत अधिक व्यस्त हैं जबकि हम आंतरिक विश्व की उपेक्षा करते हैं। हमें जीवित रहने के लिए और जनसाधारण के लाभ तथा संपन्नता में बढ़ोतरी के लिए वैज्ञानिक और भौतिक विकास की आवश्यकता है, लेकिन साथ ही हमें मानसिक शांति की भी उतनी ही आवश्यकता है। अभी भी कोई डॉक्टर आपको मानसिक शांति का इंजेक्शन नहीं दे सकता है और कोई भी बाज़ार इसे आपको बेच नहीं सकता। यदि आप लाखों-करोड़ों रुपए लेकर भी किसी सुपर मार्केट गए तो आप कुछ भी खरीद सकते हैं, लेकिन यदि आप वहाँ जाकर लोगों से मानसिक शांति माँगेंगे तो वे आप पर हँसेंगे। और यदि आप किसी डॉक्टर से कुछ पल शांत कर देने वाली कोई गोली या इंजेक्शन बल्कि सच्ची शांति देनेवाली दवा माँगेंगे तो डॉक्टर आपकी मदद नहीं कर पाएगा।

आज के अत्याधुनिक कंप्यूटर भी आपको मानसिक शांति नहीं दे सकते। मानसिक शांति को मन से ही आना चाहिए। हर कोई सुख और आनंद चाहता है, लेकिन यदि हम शारीरिक आनंद और शारीरिक कष्ट की तुलना मानसिक आनंद और मानसिक कष्ट से करें तो हम पाएंगे कि चित्त अधिक प्रभावशाली, प्रबल और उत्कृष्ट होगा। इसलिए यह उचित ही होगा कि हम मानसिक शांति को बढ़ाने के उपाय अपनाएँ और ऐसा करने के लिए आवश्यक है कि हम अपने चित्त के विषय में और जानें। जब हम पर्यावरण संरक्षण की बात करते हैं तो इसका संबंध कई अन्य बातों से भी है। मुख्य बात एक सच्ची सार्वभौमिक उत्तरदायित्व की है जो प्रेम तथा करुणा पर आधारित हो और जिसमें एक स्पष्ट जागरुकता भी हो।

माय टिबेट के अंश (मूलपाठ - महामान्य 14वें दलाईलामा, फोटोग्राफ्स और परिचय - गेलेनरॉवेल)
थेम्स एंड हडसन लि., लंदन, 1990 (पेज 53-54)


 

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