बौद्धमार्ग में गुणवत्ता वापस लाएँ

अपनी मोनलम (नए वर्ष) के प्रवचन के अंत में २७ मार्च २००६ को धर्मशाला में तिब्बत से आए तिब्बतियों के विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए अपने भाषण में दलाई लामा विभिन्न प्रश्नों पर भावुकता से बोले। उनमें से एक संबद्धित तिब्बतियों और बौद्धों के लिए धार्मिक शिक्षा, उपदेश और अभ्यास में गुणवत्ता को प्राथमिकता पर रखे जाने की आवश्यकता पर था। संपादक द्वारा अनुवादित भाषण के प्रासंगिक अंश निम्नलिखित हैं:

हम में से अधिकांश तिब्बती ज्ञान के मापदंडों को लेकर कमज़ोर हैं। धर्म की दृष्टि से बात करें तो हमारे ६ करोड़ के तिब्बती समाज में बौद्ध धर्म में आश्चर्यजनक स्तर की सच्ची आस्था रखने वाले लोग हैं। बौद्ध धर्म गहन है, यह खूब विस्तृत हुआ और इसका प्रसारण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हुआ और इसलिए यह विकसित हुआ और फला-फूला। फलस्वरूप पूरे विश्व में आज भी तिब्बत का हिमक्षेत्र ही ऐसा स्थान है जहाँ विश्व के मंच पर बौद्ध धर्म का सम्पूर्ण स्वरूप हीनयान, महायान और तांत्रिक की शिक्षाओं को संरक्षित किया जा सका है और जहाँ इस विश्व में महान नालंदा विश्वविद्यालय की धार्मिक धरोहर को पूरी तरह से संरक्षित, सुरक्षित और शुद्धतम रूप में रखा जा सका है। विशेष रूप से, बौद्ध धर्म की शिक्षाओं और अभ्यासों को उनके समग्र रूप में बचाए रखने, उनकी रक्षा करने और उनका प्रचार-प्रसार करने के संदर्भ में तिब्बत की परंपरा और पाठ्यक्रम सर्वाधिक समृद्ध हैं। संपूर्ण तिब्बती समाज को देखते हुए, तिब्बत का हिमक्षेत्र एक सहस्राब्दी से पीढ़ी दर पीढ़ी एक ऐसी जाति रही है जिसने बौद्ध धर्म का पालन, बचाव और प्रसार करते हुए उसे संरक्षित किया है। पर इसके बाद भी यह स्पष्ट है कि सामान्य लोगों में बौद्ध धर्म की जानकारी का स्तर बहुत निम्न है।

तिब्बत में हमारे लौकिक महाविहारों की धार्मिक गतिविधियों के संदर्भ में, मुख्य ध्यान उनके भिक्षु तथा भिक्षुणिओं की संख्या पर नहीं देना चाहिए, अधिक प्रासंगिक यह है कि यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि उनमें प्रशिक्षण तथा अनुशासन में गुणवत्ता को सुनिश्चित किया जाए। अन्यथा यदि अध्ययन और प्रशिक्षण का स्तर दुर्बल है तो अनुशासन की स्थिति के विषय में बोलने के लिए कुछ शेष नहीं रह जाता, भिक्षु-भिक्षुणिओं की विशाल जनसंख्या का अर्थ मात्र ऐसे भिक्षुओं और भिक्षुणिओं की एक बड़ी संख्या होगी जो किसी रूप में सहायक नहीं। अच्छी गुणवत्ता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

मैं कभी कभी देखता हूँ कि तिब्बती समुदाय में भिक्षु और भिक्षुणिओं की संख्या को बढ़ाने के बड़े प्रयास किए जा रहे हैं। मैं इसे बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं मानता। दो टूक कहूँ तो हम अपने ही देश में तिब्बतियों के अल्पसंख्यक बनने के उपस्थित खतरे के विरोध में आवाज़ उठाते हैं। खतरा वास्तविक है। इस पर हमारे पास अंतर्राष्ट्रीय समर्थन भी है। बहुत अधिक परिवर्तन होने वाले इस समय में जबकि तिब्बती जनसंख्या अत्यधिक छोटी है हम स्वयं ही इस घटती संख्या में योगदान करते प्रतीत होंगे, यदि हमने भिक्षु तथा भिक्षुणियों की जनसंख्या इतनी बढ़ा दी कि वे बहुत अधिक होंगे। इसलिए इसके बावजूद कि तिब्बती जनसंख्या पहले से ही इतनी कम है, हमने भिक्षु तथा भिक्षुणियों की संख्या और बढ़ा दी तो परिणाम हमारी जसंख्या का और अधिक कम होना होगा।

हमें लद्दाख जैसे स्थानों की परिस्थितियों के विषय में भी सोचने की आवश्यकता है। यह एक असफलता है जो कि अति अदूरदर्शिता का परिणाम है कि ऐसी भावना है कि तिब्बत के अंदर और बाहर के लौकिक विहारों में भिक्षु और भिक्षुणियों की संख्या को बढ़ाने की आवश्यकता पर बहुत अधिक ध्यान दिया जाता है जबकि भिक्षु और भिक्षुणियों के प्रशिक्षण तथा अनुशासन पर केन्द्रित ध्यान कम है।

इसलिए, हम आज जब तक परिस्थितियों के सभी दृष्टिकोणों के संबंध में नहीं सोचते, तब तक हम निश्चित रूप से यह हमारे लिए विकास का युग नहीं है। हम सबको सभी दिशाओं में देखकर सोचना चाहिए, हमारे पीछे और आगे तथा हमारे बाएँ और दाएँ। निश्चित रूप से यह ऐसा समय नहीं है, जब जो वास्तविक रूप से हमारे समक्ष प्रत्यक्ष है केवल उसके आधार पर कोई निर्णय लें। और किसी भी स्थिति में, भिक्षु और भिक्षुणिओं की संख्या की तुलना में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रशिक्षण और अनुशासन की गुणवत्ता को बनाए रखना है।

जैसा मैंने अभी हाल ही में बोधिचर्यावतार का प्रवचन देते समय कहा था, केवल सूत्रों और तंत्र ग्रंथों से परिचित हो जाने मात्र से काम नहीं चलेगा। अनुष्ठानिक ढंग से ढोल बजाकर, झांझ बजाकर और छम (धार्मिक नृत्य) कर, तथाकथित धार्मिक क्रियाओं का प्रदर्शन करना, परन्तु त्रिरत्नों (बुद्ध, धर्म और संघ) को न पहचान पाना वास्तव में हमें स्वयं ही अपने को आशीर्वाद देने जैसे खतरे में डाल सकता है। हमें इसके प्रति बहुत सावधान रहना चाहिए। बौद्ध धर्म का साक्षात्कार सिर्फ ढोल या झांझ बजाने से नहीं होता, और न ही ऐसे अनुष्ठान भक्ति को बढ़ा सकते हैं। इसके विपरीत इसके नींव रहित विचारों का एक तंत्र बन जाने का खतरा है।

इसलिए यह प्रत्येक के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि हम अपनी जड़ों से अलग न हों। तिब्बती समुदाय में सभी स्थानों पर बहुत से ऐसे उदाहरण देखे जा सकते हैं जहाँ लोग अपनी जड़ों को खो चुके थे और शाखाओं से चिपके घूम रहे हैं। निष्कर्ष रूप में, तिब्बती बौद्ध दर्शन की शिक्षा की महान परम्परा, जो हमारे पूर्वजों के समय थी, को हमारे विहारों द्वारा बनाए रखना चाहिए। उस आधार पर विहार के भिक्षु और भिक्षुणिओं को अध्ययन, प्रशिक्षण और साथ ही अनुशासन की परम गुणवत्ता सुनिश्चित करनी चाहिए और इस तरह शिक्षा और अभ्यास दोनों में आस्था बनाए रखनी चाहिए। हममें से प्रत्येक को विकास को सामान्य लोगों के आधुनिक ज्ञान के संदर्भ में लाने का प्रयास करना होगा और उस आधार पर लोगों को सक्षम करना होगा कि वे बौद्ध धर्म की गहरी समझ प्राप्त करने में सहायक हो सके और उससे भक्ति पा सके। यह उन महत्त्वपूर्ण बिंदुओं में से एक है जिसको लेकर मैं नियमित तौर पर आग्रह करता रहता हूँ।

चीन में कई दशकों में, विशेषकर सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान, जब चार वरिष्ठों को नष्ट किया जा रहा था, धर्म और संस्कृति के संपूर्ण विरोध के चलते अत्यधिक उत्पीड़न किया गया। पर मानव स्वभाव ऐसा है कि उसे आस्था और आशा के स्रोत की आवश्यक होती है और उसके परिणामस्वरूप कि ईसाई धर्म का पालन करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसी तरह से बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ रही है। विशेषकर हाल ही में बहुत से लोग तिब्बती बौद्ध दर्शन के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। पिछले दो दशकों में बड़ी संख्या में कई चीनी लोग तिब्बती बौद्ध धर्म की ओर आकृष्ट होकर तिब्बती लामाओं, आचार्यों आदि से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। आज यह संख्या और भी बढ़ रही है।

खेन रिनपोछे जिगमे फुनछोग द्वारा स्थापित पीठ का उदाहरण लें। वहाँ न केवल एक बड़ी संख्या में चीनी मूल के अनुयायी थे, पर साथ ही एक फलता-फूलता विद्यापीठ भी था। परंतु हाल ही में इसमें न केवल एक अकल्पनीय गिरावट आई पर यहाँ तक कि स्वयं उसके महान विहाराध्यक्ष का देहांत हो गया। यह एक अत्यंत दुखद घटना थी। पर फिर भी वहाँ न सिर्फ चीनी मूल के अनेकों लोग तिब्बती बौद्ध धर्म में रूचि ले रहे हैं और उसका पालन कर रहे हैं, पर वे तिब्बती लामाओं, आचार्यों से शिक्षा भी ग्रहण कर रहे हैं। ये बहुत ही सकारात्मक घटनाएँ हैं और मैं उनकी अत्यधिक सराहना करता हूँ।

तिब्बत के लामाओं, आचार्यों तथा बौद्ध धर्म के अन्य शिक्षकों और प्रचारकों को सदा स्मरण रखना होगा कि आज के युग में कि एक अत्यंत बात स्मरण रखने योग्य है कि आर्थिक और भौतिक लाभों अथवा विलासितापूर्ण जीवन जीने के लिए बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करना या शिक्षा देना भारी भूल होगी। यही नहीं, पुण्य और पाप कर्मों के दृष्टिकोण से देखने पर इसे धर्म का व्यापार करना ही माना जाएगा। धर्माभ्यासी इस तरह आचरण नहीं करेंगे। जो भी हो, सम्बन्धित व्यक्तियों को सभी प्रकार से सावधानी बरतना आवश्यक है।

यह संभव है कि कई बार लामाओं और धर्म गुरुओं में उन के प्रति अनुयायियों द्वारा चढ़ावे और सम्मान के रूप में दिखाई जा रही श्रद्धा के कारण महत्त्वपूर्ण होने का अनुभव हो और उनका अहंकार बढ़ जाए। ऐसी बातें बिलकुल भी अच्छी नहीं।

जैसा कि डोम तोनपा ने कहा है — यदि किसी को प्रत्येक व्यक्ति द्वारा भी सर्वोच्च सम्मान दिया जाता हो तो भी यह बेहतर है कि हम शांत और नम्र बने रहें। किसी को भी यह भूलना नहीं चाहिए। मेरे विषय में भी, मैं निरन्तर इस बात को याद रखता रहा हूँ। जब भी लोग मुझे परम पावन आदि के रूप में संबोधित करके अत्यधिक सम्मान देते हैं, मैं हृदय से यह याद करके स्वयं को विनम्र बनाता हूँः मैं कहीं भी, किसी के भी पास, किसी भी उद्देश्य से जाऊँ तो स्वयं को सबसे विनम्र, सबसे तुच्छ बनाए रखूँ। सबको पूरी सच्चाई के साथ उच्चतम स्तर पर बनाए रख सकूँ। मैं बिना किसी ढिलाई के हर समय यह करता हूँ। आपको भी इस प्रकार करने के लिए सोचना चाहिए।

हमारी वर्तमान स्थिति के एक दुखद पहलू के सम्बन्ध में आपसे बात करूँ - हाल ही में कई देशों जैसे ताईवान, अमेरिका, यूरोप, रूस और मंगोलिया में फर्जी तिब्बती लामाओं और धर्मगुरुओं द्वारा धर्म-विरूद्ध आचरण करने के मामले सामने आए हैं। चीन में भी तिब्बत से आने वाले नकली लामाओं और गुरुओं से सम्बन्धित सूचनाएँ सामने आयी है। यह सब अत्यंत दुखद बातें हैं।

जो हम देख रहे हैं वह यह कि सक्षम और सुयोग्य धर्मगुरु एक दीन वैराग्य में पड़े हैं, जबकि बाहर छद्म धर्मगुरु जो लज्जा के किसी भी भावना से हीन, लालच से लबालब और नंगे झूठ बोलते, दुस्साहस के साथ धर्म का मुखौटा लगाए अधार्मिक कृत्य कर रहे हैं और इस तरह बौद्ध धर्म और आस्था को बदनाम कर रहे हैं। इसे देखते हुए, सभी को अत्यंत सावधानी के साथ सोद्देश्य संकल्प लेना चाहिए। यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है कि सक्षम धर्म आचार्य धर्म और मानवता की सेवा करने का उत्तरदायित्व उठाएँ।

 

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