बौद्ध धर्म और लोकतंत्र

वाशिंगटन डी.सी., अप्रैल 1993
हजारों वर्षों से लोगों को यह विश्वास दिलाया गया है कि केवल अनुशासनात्मक उपायों को लागू करने वाला एक सत्तावादी संगठन ही मानव समाज को चला सकता है । परन्तु चूँकि लोगों में स्वतंत्र होने की एक सहज इच्छा होती है अतः स्वतंत्रता और दमन की शक्तियाँ समूचे इतिहास के दौरान निरंतर संघर्षरत रही है। आज यह स्पष्ट है कि किसकी विजय हो रही है। जनशक्ति के आंदोलनों के उदय ने, वाम और दक्षिण की तानाशाहियों को अपदस्थ करके निर्विवाद रूप से दिखा दिया है कि मनुष्य जाति न तो अत्याचार को सहन कर सकती है न उसके अधीन होकर ठीक से चल सकती है।

यद्यपि हमारे किन्हीं भी बौद्ध समाजों ने अपनी शासन प्रणालियों में लोकतंत्र जैसी किसी भी चीज़ को विकसित नहीं किया, पर मैं व्यक्तिगत रूप से धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। जब तिब्बत स्वतंत्र था, हमने अपने प्राकृतिक अलगाव को पोषित किया, इस भ्रामक विचार से कि उस तरह हम अपनी शांति और सुरक्षा को दीर्घजीवी बना सकते हैं। परिणामतः हमने बाह्य विश्व में हो रहे परिवर्तनों पर कम ध्यान दिया। हमें पता ही न चला कि कब भारत हमारे निकटतम पड़ोसियों में से एक, शांति के साथ अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन गया। बाद में हमने कष्ट उठा कर यह सीखा कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर, और घर में भी, स्वतंत्रता दूसरों के साथ साझा कर और मिलकर आनंद उठाने वाली चीज है अपने तक ही सीमित रखने वाली नहीं।

यद्यपि तिब्बत से बाहर तिब्बती, शरणार्थी की स्थिति में ला दिए गए हैं, पर हमें अपने अधिकारों को लागू करने की स्वतंत्रता है। तिब्बत में हमारे भाइयों और बहनों के पास, अपने ही देश में रहने के बाद भी जीवन का अधिकार तक नहीं है। अतः हम, जो निर्वासन में हैं, को चिंतन करने और एक भावी तिब्बत की योजना बनाने का उत्तरदायित्व प्राप्त हुआ है। इसलिए, विगत कई वर्षों में हमने विभिन्न उपायों से सच्चे लोकतंत्र के एक प्रारूप को प्राप्त करने का प्रयास किया है। सारे निर्वासित तिब्बतियों का लोकतंत्र शब्द से परिचय यह दिखाता है।

मैंने लंबे समय से उस समय की प्रतीक्षा की, जब हम एक ऐसा राजनीतिक तंत्र बना पाएँगे जो हमारी परम्पराओं और आधुनिक विश्व की माँगों दोनों के अनुकूल होगा। एक ऐसा लोकतंत्र जिसकी जड़ें अहिंसा और शांति हों। हाल में हमने ऐसे परिवर्तनों को प्रारंभ किया है जो निर्वासन में हमारे प्रशासन को और अधिक लोकतांत्रिक तथा सुदृढ़ बनाएँगे। बहुत से कारणों से मैंने निश्चय किया है कि जब तिब्बत स्वतंत्र होगा तब मैं उसका प्रमुख नहीं हूँगा अथवा सरकार में कोई भूमिका निभाऊँगा। तिब्बती सरकार का भावी मुखिया वह होगा जो लोकप्रिय रूप से लोगों द्वारा चुना हुआ होगा। इस कदम के कई लाभ हैं और यह हमें एक सच्चे और संपूर्ण लोकतंत्र बनने में सक्षम करेगा। मैं आशा करता हूँ कि ये कदम तिब्बत के लोगों को अपने देश का भविष्य निश्चित करने की अनुमति देंगे।

हमारा लोकतंत्रीकरण दुनिया भर के तिब्बतियों तक पहुँचा है। मेरा विश्वास है कि भावी पीढ़ियाँ इन परिवर्तनों को निर्वासन में हमारे अनुभव की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनेंगी। जिस प्रकार तिब्बत में बौद्ध धर्म के आगमन ने हमारे राष्ट्र को जोड़ा, मुझे विश्वास है कि हमारे समाज का लोकतंत्रीकरण तिब्बती लोगों की जीवन्तता को बढ़ाएगा और हमारी निर्णय लेने वाली संस्थाओं को हमारी सच्ची आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करने में सक्षम करेगा।

यह विचार कि लोग व्यक्तियों के रूप में स्वतंत्र भाव से एक दूसरे के साथ रह सकते हैं, सिद्धांततः समान और इसलिए एक दूसरे के प्रति उत्तरदायी बन कर, बौद्ध प्रकृति से तत्वतः मेल खाता है। बौद्धों के रूप में हम तिब्बती मानव जीवन को सबसे मूल्यवान वरदान मानते हैं और बुद्ध के दर्शन और शिक्षाओं को सर्वोच्च स्वतंत्रता का मार्ग मानते हैं। पुरुष और स्त्री दोनों के द्वारा प्राप्त किया जाने वाला लक्ष्य।

बुद्ध ने देखा कि जीवन का उद्देश्य ही सुख है। उन्होंने यह भी देखा कि जहाँ अज्ञान जीवों को अन्तहीन कुंठा और दुख में बाँधता है, प्रज्ञा मुक्त करती है। आधुनिक प्रजातंत्र इस सिद्धांत पर आधारित है कि सभी मनुष्य तत्वतः समान हैं, कि हममें से प्रत्येक को जीवन, स्वतंत्रता और सुख का समान अधिकार है। बौद्ध मत भी मानता है कि मनुष्यों को गरिमा का अधिकार है, कि मानव परिवार के सभी सदस्यों को स्वाधीनता का बराबर और अहस्तांतरणीय अधिकार है, केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के संदर्भ में नहीं बल्कि भय और अभाव से मुक्ति के आधारभूत स्तर पर भी। चाहे हम धनवान हों या निर्धन, शिक्षित हों या अशिक्षित, किसी एक देश के हों या दूसरे के, एक धर्म के हों या दूसरे के, इस विचारधारा को या किसी अन्य को मानते हुए, हममें से प्रत्येक सभी की तरह केवल एक मनुष्य है। न केवल हम सभी सुख चाहते हैं और पीड़ा से बचते हैं बल्कि हममें से प्रत्येक को इन लक्ष्यों को प्राप्त करने का समान अधिकार है।
बुद्ध ने जो संस्था स्थापित की वह था संघ, या भिक्षु समुदाय, जो अधिकांश रुप से लोकतांत्रिक ढंग से चलता था। इस समुदाय के भीतर व्यक्ति समान थे, फिर चाहे उनकी सामाजिक श्रेणी या जाति मूल कुछ भी हो। उनकी स्थिति में थोड़ी सी भिन्नता मात्र सन्यास ग्रहण करने की वरिष्ठता पर निर्भर थी। मुक्ति या संबोधि के रूप में प्रकट व्यक्तिगत स्वतंत्रता समूचे समुदाय का प्राथमिक लक्ष्य था, और ध्यान में मन को परिष्कृत करके प्राप्त की जाती थी। फिर भी, दैनिक जीवन के सम्बन्ध, दूसरों के प्रति उदारता, सहानुभूति और कोमलता के आधार पर चलाए जाते थे। अनिकेत जीवन जी कर भिक्षु संपत्ति की चिंताओं से खुद को असंपृक्त रखते थे। परन्तु वे संपूर्ण एकाकीपन में नहीं जीते थे। अन्न के लिए भिक्षाटन की उनकी परम्परा लोगों पर उनकी निर्भरता के उनके अनुभव को सशक्त ही करती थी। समुदाय के भीतर निर्णय मतदान से किए जाते थे और मतभेदों को सर्वानुमति से सुलझाया जाता था। इस तरह संघ सामाजिक समानता, संसाधनों को साझा करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रारूप का कार्य करता था।

बौद्ध मत अनिवार्यतः एक व्यावहारिक सिद्धांत है। मानवीय दुख की आधारभूत समस्या को संबोधित करते हुए यह किसी एक समाधान पर बल नहीं देता। यह पहचान करते हुए कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं, स्वभावों और क्षमताओं में बहुत भिन्न हैं, यह स्वीकार करता है कि शांति और सुख के कई मार्ग हैं। एक आध्यात्मिक समुदाय के रूप में इसकी एकता भ्रातृत्व और भगिनीत्व के जोड़ने वाली भावना से उत्पन्न हुई है। बौद्ध धर्म बिना किसी केन्द्रीकृत सत्ता के ढाई हजार साल से चला आया है। अध्ययन और अभ्यास से बार बार अपने को नवीन करते हुए, बुद्ध की शिक्षाओं में अपनी जड़ों को रखे, यह विभिन्न रूपाकारों में पनपा है। इस तरह की बहुलतावादी सोच, जिसमें स्वयं व्यक्ति ही उत्तरदायी हैं, लोकतांत्रिक दृष्टिकोण के बिलकुल अनुरूप है।

हम सब स्वतंत्रता की कामना करते हैं, पर जो चीज मनुष्यों को अलग बनाती है वह है बुद्धि। पर स्वतंत्र मनुष्यों के रूप में हम अपनी अद्वितीय बुद्धि के उपयोग से स्वयं को और अपने विश्व को समझने का प्रयास कर सकते हैं। बुद्ध ने स्पष्ट कर दिया था कि उनके अनुयायी स्वयं उनकी बातों को सुन कर जस का तस न मान लें बल्कि उनका परीक्षण करें, जाँच करें जैसे एक सुनार सोने की गुणवत्ता की करता है। पर यदि हमें अपने विवेक और रचनात्मकता का उपयोग करने से रोका जाता है तो हम मनुष्य होने का एक आधारभूत गुण खोते हैं। इसलिए, लोकतंत्र जो राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता देता है वह अतीव मूल्य और महत्त्व का है।

कोई भी शासनतंत्र संपूर्ण नहीं है, लेकिन प्रजातंत्र हमारे आधारभूत मानव स्वभाव के सबसे निकट है। यह वह अकेली स्थिर आधारशिला भी है जिस पर एक न्यायपूर्ण और मुक्त वैश्विक राजनीतिक ढाँचा बनाया जा सकता है। इसलिए यह हम सब के हित में है कि हममें से जो लोकतंत्र का आनंद उठा रहे हैं वे हर मनुष्य के इसका लाभ उठाने के अधिकार का क्रियात्मक समर्थन करें।

यद्यपि साम्यवाद ने परोपकार सहित, कई उदात्त आदर्शों की चर्चा की, परन्तु उसके सत्तारूढ़ अभिजनों की अपने विचारों को थोपने का प्रयास बहुत ही विनाशकारी साबित हुआ। इन सरकारों ने अपने समाजों को नियंत्रित करने और अपने नागरिकों को सार्वजनिक हित के लिए काम करने हेतु प्रवृत्त करने में बहुत अधिक प्रयास किए। पिछले दमनकारी शासनों पर काबू पाने के लिए प्रारंभ में कठोर संगठन की आवश्यकता रही होगी। पर एक बार उस लक्ष्य की प्राप्ति पर एक सच्चा सहकारी समाज के निर्माण के लिए ऐसी कठोरता अधिक योगदान नहीं कर सकती थी। साम्यवाद पूर्णरूप से इसलिए असफल हुआ क्योंकि वह अपने विश्वासों को बढ़ावा देने के लिए बल पर निर्भर था। अंततः, मानव प्रकृति साम्यवाद-जनित पीड़ा को सहने में असमर्थ रही।

पाशविक बल, चाहे जितनी दृढ़ता से लगाया जाए, स्वतंत्रता की आधारभूत मानवीय इच्छा को नहीं दबा सकता। पूर्वी यूरोप के शहरों में सड़कों पर उतर आने वाले लाखों लोगों ने यही सिद्ध किया। उन्होंने केवल स्वतंत्रता और प्रजातंत्र की मानवीय आवश्यकता को व्यक्त किया। उनकी माँगों का किसी नई विचारधारा से कोई सम्बन्ध न था, वे केवल स्वतंत्रता की अपनी गहन कामना व्यक्त कर रहे थे। जैसा साम्यवादी व्यवस्थाओं ने मान लिया था, लोगों को खाना, मकान और कपड़े दे देना ही पर्याप्त नहीं है। हमारी अंतरतम प्रकृति की आवश्यकता है कि हम स्वतंत्रता की अमूल्य हवा में साँस लें।

पूर्व सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप की शांतिपूर्ण क्रांतियों ने हमें कई महान शिक्षाएँ दी है। एक है सत्य का मूल्य। लोग किसी व्यक्ति या किसी तंत्र द्वारा धमकाया जाना, झूठ बोला जाना या ठगा जाना पसंद नहीं करते। ऐसे काम आत्यंतिक मानव चेतना के विरुद्ध हैं। इसलिए, वंचना और बल-प्रयोग का उपयोग करने वाले भले ही अल्पावधि में बहुत अधिक सफलता पा लें किन्तु अंततः वे उखाड़ फेंके जाएंगे।

सत्य, स्वतंत्रता और लोकतंत्र का सर्वोत्तम गारंटर और सच्चा आधार है। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि आप निर्बल हैं या सबल, या आपके उद्देश्य के बहुत या कम मानने वाले हैं, अंततः विजय सत्य की होगी। हाल के बहुत के सफल मुक्ति आंदोलन लोगों की सबसे आधारभूत भावनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति पर खड़े हुए हैं। यह इस बात का अनमोल स्मरण कराता है कि हमारे अधिकांश राजनैतिक जीवन में सत्य का अब भी गंभीर रूप से अभाव है। विशेषतः अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के निर्वाह में हम सत्य का बहुत कम सम्मान करते हैं। अनिवार्यतः, दुर्बल राष्ट्र शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा नचाए और दबाए जाते हैं, वैसे ही जैसे अधिकतर समाजों के दुर्बल वर्ग अधिक समृद्ध और शक्तिशाली वर्गों के हाथों कष्ट पाते हैं। अतीत में, सत्य की सीधी-सरल अभिव्यक्ति को अव्यावहारिक कह कर खारिज कर दिया जाता रहा है, पर पिछले इन कुछ वर्षों ने सिद्ध किया है कि यह मनुष्य के चित्त की एक जबर्दस्त शक्ति है, और परिणामतः इतिहास को आकार देने की भी।

जैसे जैसे हम बीसवीं सदी के अंत के निकट पहुँच रहे हैं हम पाते हैं कि विश्व और छोटा हो गया है और विश्व के लोग लगभग एक समुदाय के बन गए हैं। हम अपने समक्ष खड़ी गंभीर समस्याओं के कारण भी एक दूसरे के समीप खिंचे जा रहे हैं – जनसंख्यावृद्धि, घटते प्राकृतिक संसाधन और एक पर्यावरणीय संकट जो हम सबके इस छोटे से ग्रह पृथ्वी पर अस्तित्व के आधार को ही खतरे में डाल रहा है। मैं विश्वास करता हूँ कि हमारे समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए मनुष्यों को सार्वभौमिक उत्तरदायित्व की एक उच्चतर भावना विकसित करनी पड़ेगी। हममें से प्रत्येक को केवल अपने, परिवार के राष्ट्र के लिए ही नहीं बल्कि समूची मानवता के कल्याण के लिए कार्य करना सीखना होगा। सार्वभौमिक उत्तरदायित्व मानवीय अस्तित्व की असली कुंजी है। यह विश्व शांति, प्राकृतिक संसाधनों के समतापूर्ण उपयोग और पर्यावरण की सही देखरेख का सर्वश्रेष्ठ आधार है।

सहयोग की यह उत्कट आवश्यकता मानवता को सशक्त ही कर सकती है, क्योंकि यह हमारी इस समझ में सहायता करती है कि नई विश्व व्यवस्था की सबसे सशक्त आधारशिला केवल वृहत्तर राजनैतिक और आर्थिक गठबंधन ही नहीं हैं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति द्वारा प्रेम और करुणा का सच्चा अभ्यास भी है। ये गुण मानवीय सुख के चरम स्रोत हैं और इनकी आवश्यकता हमारे अस्तित्व का अंतरतम है। करुणा का अभ्यास केवल अव्यावहारिक आदर्शवाद का एक लक्षण मात्र नहीं है, अपितु दूसरों और स्वयं अपने सर्वश्रेष्ठ हितों को साधने का सबसे प्रभावशाली उपाय है। हम जितने अधिक – राष्ट्रों या व्यक्तियों के रूप में – दूसरों पर निर्भर होंगे उतना अधिक उनके कल्याण को सुनिश्चित करना हमारे अपने हित में होगा।

इस सदी में सभ्यता द्वारा तीव्र प्रगति के बावजूद, मैं मानता हूं कि हमारी वर्तमान दुविधा का सबसे तत्कालीन कारण मात्र भौतिक विकास पर हमारा अनुचित ज़ोर है। उसका पीछा करने में हम इतने डूब गए हैं कि अनजाने में ही, हम सबसे आधारभूत मानवीय आवश्यकताओं – प्रेम, दया, सहयोग और सहानुभूति को पोषित करना भुला बैठे हैं। यदि हम किसी से परिचित नहीं या किसी व्यक्ति या समूह विशेष से जुड़ा हुआ अनुभव नहीं करते तो हम उनकी आवश्यकताओं की सरलता से उपेक्षा कर देते हैं। पर फिर भी मानवीय समाज का विकास पूर्ण रूप से लोगों के एक दूसरे की सहायता करने पर आधारित है। एक बार हमने वह बुनियादी मानवता गँवा दी जो हमारा आधार है, तो मात्र भौतिक सुधारों के पीछे दौड़ने से क्या प्राप्त होगा?

वर्तमान परिस्थितियों में, कोई यह नहीं मान सकता कि कोई दूसरा हमारी समस्याओं का समाधान करेगा। प्रत्येक व्यक्ति का उत्तरदायित्व हमारे वैश्विक परिवार को ठीक दिशा में ले जाने का है और हममें से प्रत्येक को यह उत्तरदायित्व स्वीकार करना होगा। हमें जो लक्ष्य सामने रखना है वह हमारे समाज का समान लक्ष्य है। यदि समाज अपने पूर्ण रूप में समृद्ध है तो उसमें निहित प्रत्येक व्यक्ति या उसके भीतर का कोई संगठन स्वाभाविक रूप से उससे लाभान्वित होगा। वे स्वाभाविक रूप से प्रसन्न होंगे। पर यदि समूचा समाज ही ध्वस्त हो जाता है तो हम संघर्ष करने तथा अपने अधिकारों की माँग करने कहाँ जाएँगे?

कम से कम मैं सचमुच यह विश्वास करता हूँ कि व्यक्ति समाज में परिवर्तन ला सकते हैं। एक बौद्ध भिक्षु के रूप में मैं स्वयं करुणा विकसित करने का प्रयास करता हूँ – केवल धार्मिक ही नहीं अपितु एक मानवीय दृष्टिकोण से भी। अपने को इस उदात्त भाव में लाने के लिए मैं प्रायः ऐसी कल्पना करना उपयोगी पाता हूँ कि मैं एक अकेला व्यक्ति, एक ओर हूँ और दूसरी ओर शेष सारे मनुष्यों का विराट समूह। तब मैं स्वयं से पूछता हूँ, “किसके हित अधिक महत्त्वपूर्ण हैं?” तब उस समय मेरे लिए यह बिलकुल स्पष्ट होता है कि मैं कितना भी महत्त्वपूर्ण अनुभव क्यों न करूँ मैं सिर्फ एक हूँ, जबकि अन्य बहुमत में हैं।

 

 

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