चित्त् शोधन पद ५ और ६

मेरे प्रति कोई अन्य ईर्ष्यावश

गाली-गलौज निन्दा आदि अनुचित व्यवहार करें।

तो भी मैं पराजय को धारण करुँ

तथा विजय दूसरों को अर्पित करुँ।। 5

यहाँ जो बात बताई जा रही है कि जब दूसरे अकारण या अन्याय करते तुम्हे उकसाएँ तो एक नकारात्मक प्रतिक्रिया न देते हुए, एक परोपकार के सच्चे अभ्यासी के रूप में तुम्हेँ उनके प्रति सहनशील होना चाहिए। आपको ऐसे व्यवहार से अनुद्विग्न रहना चाहिए। अगले पद में हम सीखते हैं कि हमें न केवल ऐसे लोगो के प्रति सहनशील होना चाहिए पर वास्तव में हमें उन्हेँ अपना आध्यात्मिक गुरु मानना चाहिए ।

इसमेँ कहा गया हैः

जिस पर मैंने उपकार किया

और जिससे बड़ी अपेक्षा रखता हूँ, यदि वह।

अत्यन्त अनुचित रूप से हानि पहुँचायें, तब भी मैं

उसे परम कल्याणमित्र के रूप मेँ देखूँ।। 6

आचार्य शांतिदेव के बोधिसत्त्वचर्यावतारमें इस पर विस्तृत रूप से चर्चा की गई है कि हम किस तरह इस प्रकार के व्यवहार का विकास कर सकते हैं, और यह सीख सकते हैं कि जो हम पर अत्याचार कर रहे हैं उन्हें हम आध्यात्मिक शिक्षा की वस्तु मानें। साथ ही आचार्य चन्द्रकीर्ति के मध्यमाकवतार के तीसरे अध्याय में धैर्य और सहनशीलता के विकास पर बहुत गहन रूप से प्रेरणात्मक तथा प्रभावशाली शिक्षाएँ निहित हैं।


 

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