चित्त शोधन पद : ४

जब मैं दुष्ट प्रवृति के सत्वों को देखूँ
प्रबल पाप और पीड़ा द्वारा दमित ।
उन्हें प्रिय समझूँ क्योंकि वे दुर्लभ हैं
 मानो मुझे रत्न निधि प्राप्त हुई हो ।।

इस पद का संदर्भ विशेष रूप से उन लोगों से है जो सामाजिक रूप से हाशिए पर हैं, संभवतः उनके व्यवहार, उनके स्वरूप, उनके अभाव अथवा िकसी रोग के कारण । जो भी बोधिचित्त का अभ्यास करते हैं, उन्हें ऐसे लोगों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, जैसे मानो उनसे मिलकर, आपको कोई सच्चा कोश मिल गया हो। उनके प्रति घृणा की भावना के बजाय ऐसे परोपकारी सिद्धांतों के एक सच्चे अभ्यासी उनके साथ रहकर उनसे संबंध स्थापित करने की चुनौती माननी चाहिए। वास्तव में देखा जाए हम जिस तरह इस प्रकार के लोगों से व्यवहार करते हैं वह हमारे आध्यात्मिक अभ्यास को एक महान प्रोत्साहन दे सकता है।

इस संदर्भ में मैं कई ईसाई भाइयों और बहनों द्वारा प्रतिस्थापित उदाहरण देना चाहता हूँ, जो मानवीय और देखभाल व्यवसायों में संलग्न हैं और जो विशेष रूप से समाज के हाशिए पर के सदस्यों की ओर निर्देशित है। हमारे समय का एक ऐसा उदाहरण दिवंगत मदर टेरेसा थी, जिन्होंने अपना जीवन निःसहाय लोगों की देख- रेख में समर्पित कर दिया। वह इस पद में वर्णित आदर्श का उदाहरण थी।

इसी महत्त्वपूर्ण बिन्दु के कारण जब मैं विश्व के विभिन्न भागों के बौद्ध केन्द्रों के सदस्यों से मिलता हूँ, तो मैं प्रायः उनका ध्यान इस ओर दिलाता हूँ कि एक बौद्ध केंद्र के लिए केवल शिक्षा या ध्यान के कार्यक्रम पर्याप्त नहीं हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि कई प्रभावशाली बौद्ध केन्द्र हैं और कुछ एकांत ध्यान केन्द्र हैं, जहाँ पाश्चात्य भिक्षुओं को इतना अच्छा प्रशिक्षण मिला है कि वे पारम्परिक तिब्बती रूप से क्लेरिनट (एक प्रकार की शहनाई) बजा सकते हैं। पर मैं उन पर यह भी ज़ोर देता हूँ कि वे अपनी गतिविधियों के कार्यक्रमों में सामाजिक तथा देखभाल के आयाम भी लाएँ ताकि बौद्ध शिक्षा में प्रस्तुत िकए गए सिद्धांत समाज में योगदान कर सकें।

मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता होती है कि कुछ बौद्ध केन्द्रंों ने बौद्ध सिद्धांतों को सामाजिक स्तर पर लागू करना प्रारंभ किया है। उदाहरण के िलए मैंने ऑस्ट्रेलिया के बौद्ध केन्द्रंों के बारे में सुना है, जिन्होंने मरणासन्न रोगियों के िलए आश्रम स्थापित किए हैं और मरणासन्न व्यक्तियों की सहायता कर रहे हैं और एड्स के रोगियों की भी देखभाल कर रहे हैं। मैंने ऐसे बौद्ध केन्द्रों के बारे में भी सुना है जो जेलों में कुछेक प्रकार की आध्यात्मिक शिक्षा में लगे हैं, जहाँ वे व्याख्यान और परामर्श देते हैं। मेरे विचार से ये महान उदाहरण हैं। निस्संदेह यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है जब ऐसे लोग विशेषकर बन्दी, जो अपने को समाज से त्यक्त अनुभव करते हैं। यह न केवल उनके िलए यह अत्यंत पीड़ाकुल है, पर एक व्यापक दृष्टिकोण से, यह समाज के िलए भी एक क्षति है। हम उनके िलए एक सकारात्मक सामाजिक सहयोग का अवसर प्रदान नहीं कर रहे, जबकि उनमें वास्तव में ऐसा करने की क्षमता है। अतः मुझे लगता है कि समाज के लिए समग्र रूप में यह महत्त्वपूर्ण है कि ऐसे व्यक्तिओं को नकारे नहीं, पर उन्हें गले लगाकर उनकी योगदान की क्षमता को स्वीकार करें। इस तरह उन्हें अनुभव होगा कि समाज में उनका एक स्थान है और वे सोचना प्रारंभ करेंगे कि संभवतः उनके पास भी देने के लिए कुछ है। 

 

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