चित्त शोधन पद १

मैं सभी सत्त्वों को

चिन्तामणि से भी बढ़कर।                

परम अर्थ की सिद्धि के आशय से

नित्य परम प्रिय के रूप में ग्रहण करुँ।। 1

यह चार पंक्तियाँ सभी अन्य सत्त्वों के प्रति प्रेम की भावना के संवर्धन के लिए है। इस पद में जिस मुख्य बिंदु पर बल दिया गया है वह ऐसे चिंतन का विकास है जिसके कारण आप अन्य सत्त्वों को उतना ही बहुमूल्य समझते हैं जितना कि कीमती रत्नों को। यह प्रश्न उठाया जा सकता है ,"हमें इस प्रकार के विचार को संवर्धित करने की क्या आवश्यकता है कि अन्य सत्त्व अनमोल तथा कीमती हैं?"

एक अर्थ में हम कह सकते हैं कि अन्य सत्त्व केवल हमारे दैनिक जीवन के व्यवहार में ही नहीं परन्तु वास्तव में हमारे आनंद, सुख, सम्पन्नता जैसी अनुभूतियों का स्रोत हैं। हम देख सकते हैं कि सभी मनचाही अनुभूतियाँ जिन्हें हम सँजो कर रखते हैं, या फिर प्राप्त करना चाहते हैं, वे सभी दूसरों के सहयोग तथा पारस्परिक व्यवहार पर निर्भर करते हैं। यह बहुत ही स्पष्ट तथ्य है। इसी तरह मार्ग के अभ्यासी होने के दृष्टिकोण से आप जितने उच्च स्तर की अनुभूतियाँ प्राप्त करते हैं और अपने आध्यात्मिक मार्ग में जितना विकास करते हैं, वह अन्य सत्त्वों के सहयोग तथा आपसी व्यवहार पर निर्भर करता है। इसके अलावा बुद्धत्व के परिणामी अवस्था के स्तर पर बुद्ध की वास्तविक करुणा बिना किसी प्रयास के स्वतः केवल प्राणियों के संदर्भ ही हो सकती है,क्योंकि वह उन प्रबुद्ध कार्यों के पाने वाले हैं और उनके लिए लाभकारी हैं। इस तरह हम देख सकते हैं कि अन्य सत्त्व एक अर्थ में हमारे आनंद ,खुशहाली और सुख के सच्चे स्रोत हैं। जीवन के आधारभूत आनंद और सुख साधन जैसे भोजन, आश्रय, वस्त्र और संगति सभी दूसरे सत्त्वों पर निर्भर होते हैं, प्रसिद्धि और ख्याति भी वैसी ही है। हमारे सुख तथा सुरक्षा की भावना कि दूसरे हमारे विषय में क्या सोचते हैं हमारे प्रति उनके प्रेम पर निर्भर करता है।यह ऐसा ही है जैसे कि मानों हमारे अस्तित्व का आधार ही मानवीय प्रेम है। प्रेम के बिना हमारा जीवन प्रारंभ नहीं हो सकता और हमारा पोषण, उचित विकास इत्यादि सब कुछ उस पर निर्भर है। एक शांत चित्त प्राप्त करने के लिए आपमेँ दूसरों के लिए सोचने की भावना जितनी होगी आपका आत्मसंतोष उतना ही गहन होगा। मैं सोचता हूँ कि जिस क्षण आप दूसरों के प्रति सोचने की भावना का विकास करेंगे तो दूसरे सकारात्मक दिखाई देते हैँ। यह मात्र आपकी अपनी चित्त प्रवृत्ति के कारण है। दूसरी ओर, यदि आप किसी को अस्वीकृत करते हैं तो वे आपको नकारात्मक रूप से प्रतीत होंगे।दूसरी एक बात जो मेरे लिए बिलकुल स्पष्ट है, वह यह कि,  जिस क्षण से आप केवल अपने  बारे में सोचते हैं तो आपके चित्त का पूरा  केन्द्र संकीर्ण होता जाता है और इस संकीर्ण संकेन्द्रन के कारण अनचाही वस्तुएँ बहुत विशाल लग सकती है और तुम्हेँ डर और बेचैनी की भावना से भर सकती है और तुम पर दुःख हावी हो सकता है। पर जिस क्षण तुम दूसरों के भले के विषय में सोचते हो तो तुम्हारा चित्त व्यापक हो जाता है। उस व्यापक दृष्टिकोण में, तुम्हारी अपनी समस्यायें अर्थहीन सी जान पड़ती है और इससे बड़ा अंतर पड़ता है। यदि तुम्हारे अंदर दूसरों के लिए चिन्ता है, तो अपनी कठिन परिस्थितियों और समस्याओं के बावजूद तुममें एक प्रकार की आंतरिक शक्ति होगी। इस शक्तिके होते हुए आपको अपनी समस्याएँ कम महत्त्वपूर्ण और कष्टदायी लगेगी। अपनी खुद की समस्याओं से परे जाकर और दूसरों का ध्यान रखने से आप आंतरिक शक्ति, आत्मविश्वास, साहस तथा अधिक शांति प्राप्त कर पाएँगे। यह एक स्पष्ट उदाहरण है कि किस तरह व्यक्ति का चिंतन बहुत परिवर्तन ला सकता है।

बोधिचर्यावतार कहता है कि जब हम दूसरों की पीड़ा अपने पर लेने के कारण पीड़ा का अनुभव करते हैं और जो पीड़ा अपने ही दुःख और कष्ट के कारण होती है उनमें बहुत अंतर होता है। पहले में एक प्रकार की बेचैनी का भाव होता है क्योंकि आप किसी अन्य का दुःख बाँट रहे हैं, परन्तु जैसे शांतिदेव संकेत करते हैं कि उसमें एक प्रकार की स्थिरता भी होती है, क्योंकि एक अर्थ में आप स्वेच्छा से उस पीड़ा को ले रहे हैं। दूसरों के दुःख में स्वेच्छा से भाग लेने में एक प्रकार की शक्ति और एक विश्वास का भाव होता है। पर दूसरी स्थिति में जब आप अपनी  पीड़ा और दुःख स्वयं झेलते हैंतो उसमें एक अस्वैच्छिकता का तत्त्व रहता है और आपके नियंत्रण में न होने के कारण आप दुर्बलता का अनुभव करते हैं और वह आप पर पूरी तरह से हावी हो जाता है। परोपकार तथा करुणा से संबंधित बौद्ध शिक्षाओं में कुछ अभिव्यक्तियों का उपयोग होता है जैसे "व्यक्तियों को अपनी भले की न सोचकर दूसरों के भले की सोचना चाहिए।"दूसरों की पीड़ा बाँटकर उसका दुःख झेलना जैसे अभ्यास के इन वक्तव्यों को उचित संदर्भ में समझा जाना चाहिए। आधारमूल बात यह है कि यदि तुम्हारे अंदर स्वयं को प्रेम करने की क्षमता नहीँ है तो दूसरों के विषय में सोचने जैसी भावना को बनाने का कोई भी आधार नहीँ है। अपने आप से प्रेम का अर्थ यह नहीँ है तुम अपने आप के प्रति ऋणी हो। बल्कि अपने आप से प्रेम करना या फिर स्वयं के प्रति करुणा का भाव रखना मानवीय अस्तित्व के आधारभूत तत्त्व पर आधारित होना चाहिएः कि हम सब में सुख को प्राप्त करने और दुःख से बचने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। एक बार स्वयं को लेकर यह आधार हो, तो यह अन्य सत्त्वोंपर भी लागू किया जा सकता है। इसलिए जब हम धर्म शिक्षाओं में ऐसे कथन पाते हैं "अपनी भले की न सोचकर दूसरों के भले की सोचो ", तो हमें उनका अर्थ करुणा के उद्देश्य के अनुसार स्वयं को प्रशिक्षित करने के अर्थ में समझना चाहिए। यह महत्त्वपूर्ण है यदि हम आत्मकेन्द्रित ढंग से विचारों में न डूबें जो दूसरे सत्त्वों पर हमारे कार्यों के प्रभाव को अनदेखा करते हैं। जैसा मैंने पहले कहा कि हमारे आनंद, सुख और सफलता में अन्य सत्त्वों के करुणा की क्या भूमिका रही है, को समझने के लिए हम अन्य सत्त्वों को अनमोल समझने के चित्त का विकास कर सकते हैं। यह सबसे पहला कारण है।

दूसरा कारण निम्नलिखित है, विश्लेषण तथा चिंतन, आप समझ जाएँगे कि हमारे अधिकांश कष्टों, दुःखों तथा पीड़ा का कारण हमारी आत्मकेन्द्रित प्रवृत्ति जो दूसरों के कल्याण की चिंता किए बिना स्वकल्याण में रत् है, का परिणाम है, जबकि हमारा अधिकांश सुख,खुशी और अपने जीवन में सुरक्षा की भावना उन विचारों तथा भावनाओं से आती है जो अन्य सत्त्वों के कल्याण को महत्त्व देती है। इन दोनों विचारों तथा भावनाओं की परस्पर तुलना करने से हम दूसरों के कल्याण की आवश्यकता के प्रति और अधिक आश्वस्त हो जाते हैं।

दूसरों के कल्याण को पोषित करने के संबंध में एक और तथ्य हैः कि वास्तव में अन्य सत्त्वों के कल्याण के लिए काम करते हुए एक उपोत्पाद के रूप में हमारे अपने कार्य तथा इच्छाएँ पूरी हो जाती है। जैसा कि जे च़ोखापा प्रबुद्धता के मार्ग की महान व्य़ाख्या (लमरिम छेनमो) में इंगित करते हैं,“कोई अभ्यासी जितना अधिक उन कार्यों और विचारों में लगा रहताहै जो कि अन्य सत्त्वों की भलाई की ओर केन्द्रित है तो बिना किसी अलग प्रयास के उनकी अपनी इच्छाओं की पूर्ति एक उपोत्पाद के रूप में हो जाएगी।”

आप में से कुछ लोगों ने जो मैं अकसर कहता हूँ कि कुछ एक अर्थों में बौद्ध मार्ग के करुणाशील अभ्यासी बोधिसत्त्व, बुद्धिमान रूप से स्वार्थी हैं जबकि हम जैसे लोग मूर्खतापूर्ण ढंग से स्वार्थी हैं।  हम अपने विषय में सोचते हैं और दूसरों की परवाह नही करते और उसका परिणाम यह होता है कि हम सदा नाखुश रहते हैं। समय आ गया है कि हम और बुद्धिमानी से सोचें, है ना?  यह मेरा विश्वास है। एक समय यह प्रश्न उठेगा, “ क्या हम सच में अपना व्यवहार बदल सकते हैं? ”

मेरे थोड़े से अनुभव पर बिना किसी हिचकिचाहट के मेरा उत्तर होगा, “ हाँ!“। जिसे हम चित्त कहते हैं वह बहुत अजीब है। कभी कभी वह बहुत हठीला होता है और उसे बदलना बहुत कठिन है। पर निरंतर प्रयास और तर्क संगत कारणों पर रखे विश्वास से कभी कभी हमारे चित्त अत्यंत ईमानदार होते हैं। जब हम सच्चाई से अनुभव करते हैं कि कुछ परिवर्तन की आवश्यकता है, तो हमारा चित्त परिवर्तित हो सकता है। केवल इच्छा और प्रार्थना करते रहने से आपके चित्त में परिवर्तन नहीं हो सकता, परन्तु निश्चय तथा तर्क से, तर्क जो अंततः आपके अनुभव पर आधारित हों, आप अपने चित्त में परिवर्तन ला सकते हैं। यहाँ समय एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है, और समय रहते हमारे मानसिक व्यवहार में निश्चित रूप से बदलाव आ सकता है। मुझे यहाँ एक बात कहनी चाहिए कि कुछ लोग,खासकर वे जो स्वयं को बहुत यथार्थवादी और व्यावहारिक ढंग से देखते हैं, वे वास्तव में बहुत ही यथार्थवादी हैं और व्यावहारिकता से ग्रसित हैं। वे यह सोच सकते हैं,”सभी सत्त्वों के सुख की कामना का विचार और अन्य सत्त्वों के कल्याण के प्रति विचारों के पोषण की भावना अवास्तविक और अत्यंत आदर्शवादी है। उनका व्यक्ति के चित्त परिवर्तन में अथवा किसी प्रकार के चित्त अनुशासन की प्राप्ति में कोई योगदान नहीं है क्योंकि वे पूरी तरह से पहुँच के बाहर हैं।” कुछ लोग ऐसा सोच कर अनुभव कर सकते हैं कि शायद एक प्रभावकारी ढंग एक छोटे लोगों के समूह से प्रारंभ किया जाए जिनके साथ हमारी सीधी बातचीत हो सके। वे सोचते हैं कि ये लोग इस घेरे को और बड़ा कर सकते हैं। उनकी सोच है कि सभी सत्त्वों के बारे में सोचने में कोई तुक नहीं क्योंकि उनकी संख्या असीम है। वे इस ग्रह के निवासियों के लिए एक प्रकार के जुड़ाव की भावना का अनुभव कर सकते हैं, पर वे यह सोचते हैं कि इस बहु मंडलीय विश्व और ब्रह्मांडों के असीम सत्त्वों का एक व्यक्ति के रूप में उनके निजी अनुभव से कुछ लेना देना नहीं है। वे यह पूछ सकते हैं, कि ऐसे चित्त के पोषण के प्रयास का क्या लाभ जो अपने में सभी सत्त्वों को शामिल करने की कोशिश करता है? एक प्रकार से वह एक वैध आपत्ति हो सकती है, पर यहाँ समझने वाली महत्त्वपूर्ण बात ऐसे परोपकारी भावनाओं के पोषण का प्रभाव है।

मुख्य बात अपनी करुणा के दायरे का विकास इस प्रकार करना है कि उसमें जीवन के किसी भी रूप तक जिसमें पीड़ा तथा सुख का अनुभव करने  की क्षमता हो शामिल किया जा सके। यह किसी जीव को सत्त्व के रूप में परिभाषित करना है। इस प्रकार की भावना बहुत प्रबल होती है और इसके प्रभावशाली होने के लिए यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक जीवित की एक विशिष्ट नाम के आधार पर पहचान की जाए। उदाहरण के लिए अनित्यता के सार्वभौमिक रूप को लें। जब हम इस प्रकार के विचार का परिष्कार करते हैं कि वस्तुएँ तथा घटनाएँ अनित्य हैं , तो अनित्यता पर विश्वास करने के लिए हमें इस ब्रह्मांड की हर वस्तु के विषय में सोचने की ज़रूरत नही है। चित्त इस प्रकार कार्य नहीं करता। इसलिए इस बिंदु को समझना महत्त्वपूर्ण है ।

पहले पद में मैं कर्ता का संदर्भ बहुत स्पष्ट रूप में आया हैः “मैं दूसरों को सदा अनमोल समझूँ।“  इस स्तर पर यह मैं किस ओर संकेत कर रहा है एक बौद्ध दृष्टिकोण से शायद चर्चा करना सहायक होगा। साधारणतया इस बात को लेकर कोई मतभेद नहीं है कि लोग – आप, मैं, और दूसरों का अस्तित्व है। हमउस व्यक्ति के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न नहीं लगाते जो दुःख के अनुभव को झेलता है। हम कहते हैं,”मैं अमुक अमुक देखता हूँ” और”मैं अमुक अमुक सुनता हूँ“ और हम निरंतर हम अपनी भाषा में लगातार व्यक्तिवाचक सर्वनाम का प्रयोग करते हैं। सांवृतिक स्तर पर आत्म का अस्तित्व, जिसका अनुभव हम सब अपने दैनिक जीवन में करते हैं, को लेकर कोई विवाद नहीं है। परन्तु प्रश्न उठता है जब हम यह समझने का प्रयास करते हैं कि यह आत्म अथवा मैं क्या है। ऐसे प्रश्नों के उत्तर खोजते हुए हम इस विश्लेषण को अपने रोज़ के जीवन से थोड़ा आगे ले जाना चाहेंगे – हम उदाहरण के लिए अपने उन दिनों की याद करना चाहेंगे जब हम युवा थे। जब आप अपने युवा होने की कोई बात याद करते हैं तो उस समय के शरीर की स्थिति और उस समय के आत्म की भावना से एक निकट का संबंध पाते हैं। जब आप छोटे थे, तो एक आत्म था। जब आप बड़े होते हैं तो एक आत्म है। एक ऐसा आत्म भी है जो दोनों ही अवस्थाओं में समाया है। एक व्यक्ति अपनी छोटी उम्र के अनुभवों को याद कर सकता है। एक व्यक्ति अपने बुढ़ापे के अनुभवों के विषय में सोच सकता है, इत्यादि, इत्यादि। हम अपनी शारीरिक अवस्था और आत्म, हमारी मैं चेतना में निकट पहचान देख सकते हैं। कई दार्शनिकों और विशेषकर धार्मिक चिंतकों ने उस व्यक्ति की प्रकृति, उस आत्म अथवा मैं को समझने का प्रयास किया है जो समय के पार अपनी निरंतरता बनाए रखती है। भारतीय परंपरा में तो यह विशेषकर महत्त्वपूर्ण है। अबौद्ध भारतीय परंपराएँ आत्मा की बात करती है जिसका एक मोटा अनुवाद होगा “आत्म“ अथवा “आत्मा“ और दूसरे अबौद्ध धार्मिक परमंपराओं में हम किसी प्राणी की आत्मा को लेकर चर्चा सुनते हैं, इत्यादि। भारतीय संदंर्भ में आत्मा का एक कर्ता के रूप में एक विशिष्ट अर्थ होता है जो कि व्यक्ति के अनुभवजन्य तथ्यों से स्वतंत्र होता है। उदाहरण के लिए हिन्दू परम्परा में पुनर्जन्म का विश्वास है जो कई तर्कों की प्रेरणा रही है। मैंने भी कुछ रहस्यात्मक अभ्यासों के संदर्भ देखे हैं जिसमें एक चेतना या आत्मा किसी हाल ही में मरे व्यक्ति का शरीर धारण करती है। यदि हम पुनर्जन्म को समझना चाहते हैं, यदि हम किसी आत्मा द्वारा शरीर धारण करने को समझना चाहते हैं तो एक प्रकार के स्वतंत्र कर्ता को स्वीकृति देनी होगी जो कि व्यक्ति के अनुभवजन्य तथ्योँ से स्वतंत्र है। एक समूचे तौर पर अबौद्ध भारतीय परम्पराएँ मोटे रूप से इस निष्कर्ष पर पहुँच चुकी है कि आत्म का संबंध इस स्वतंत्र कर्ता या आत्मा से है। इस का संबंध उससे है जो हमारे शरीर तथा चित्त से स्वतंत्र है। कुल मिलाकर बौद्ध परंपरा ने एक आत्म, जो कि शरीर तथा चित्त से स्वतंत्र है, को स्वीकार करने के लोभ से स्वयं को बचा रखा है। बौद्ध परंपराओं में इस तथ्य को लेकर सहमति है कि आत्म अथवा मैं को शरीर तथा चित्त संग्रह के रूप में समझा जाना चाहिए।

पर, जब हम मैं अथवा आत्म कहते हैं तो उसका संदर्भ क्या है, उसको लेकर बौद्ध चिंतकों में भी मतभेद हैँ। कई बौद्ध विद्वानों का यह मानना है कि अंततः हमें आत्म की व्यक्ति की चेतना से पहचान करनी चाहिए। विश्लेषण के द्वारा हम दिखा सकते हैं किस तरह हमारा शरीर एक प्रकार का आकस्मिक तथ्य है, और जो समय के परे निरंतर रहता है वह वास्तव में व्यक्ति की चेतना है।

निस्सन्देह अन्य बौद्ध चिन्तकों ने आत्म को चेतना के साथ पहचान को अस्वीकृत किया है।

बुद्धपालित तथा चन्द्रकीर्ति जैसे बौद्ध चिन्तकों ने एक अनंत, स्थायी और ठोस आत्मा की खोज की इच्छा का परित्याग किया है। उन्होंने तर्क दिया है कि उस तरह के तर्क संगत विचारों के पीछे लगने का अर्थ किसी वस्तु को ग्राह्य करने की अंतर में छिपी आवश्यकता का शिकार होना है। ऐसी विचारधारा को लेकर आत्म की प्रकृति के विश्लेषण से कुछ न प्राप्त होगा क्योंकि इस प्रकार की खोज आध्यात्मिक है, यह एक आध्यात्मिक आत्म की खोज है जिसमें बुद्धपालित और चन्द्रकीर्ति का तर्क है कि हम प्रतिदिन की भाषा और अनुभव की समझ की सीमा से परे जा रहे हैं। अतः आत्म, व्यक्ति, और कर्ता की समझ पूरी तरह इस आधार पर होना चाहिए कि हम अपनी आत्म की भावना का अनुभव किस प्रकार करते हैं। हमें आत्म अथवा व्यक्ति की सांवृतिक समझ से परे नही जाना चाहिए। हमें अपने अस्तित्व को हमारे शारीरिक और मानसिक अस्तित्व के रूप में समझना चाहिए कि आत्म और व्यक्ति चित्त तथा शरीर पर आधारित नाम मात्र है। चन्द्रकीर्ति ने अपने मध्यमकावतार में रथ का उदाहरण दिया है। जब आप रथ के तथ्य का विश्लेषण करते हैं तो आपको ऐसा कोई आध्यात्मिक या ठोस रूप में कोई सच्चा रथ मिलेगा जो कि उन भागों से स्वतंत्र होगा जिससे रथ बनता है। पर इसका यह अर्थ नहीं कि रथ का अस्तित्व नहीं है। इसी तरह जब हम आत्म, आत्म की प्रकृति का इस प्रकार विश्लेषण करते हैं तो हमें ऐसा आत्म नहीं मिलता जो चित्त तथा शरीर से स्वतंत्र हो जो किसी व्यक्ति का अस्तित्व है। पारस्परिक निर्भरता से उत्पन्न (प्रतीत्य समुत्पाद) आत्म की ऐसी समझ को हमें अन्य सत्त्वों की समझ के लिए काम में लाना चाहिए। एक बार फिर अन्य सत्त्व ऐसे नाम हैं जो शारीरिक और मानसिक अस्तित्व पर निर्भर हैं। शारीरिक और मानसिक अस्तित्व स्कंधों पर आधारित हैं,जो कि सत्त्वों के मनोभौतिक तत्त्व हैं।

 

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