कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय सैन डिएगो प्रारंभ

17 जून 2017

सैन डिएगो, सीए, संयुक्त राज्य अमेरिका, १७ जून २०१७ - भोर की धुंध अभी भी सान डिएगो के ऊपर छाई हुई थी जब परम पावन दलाई लामा गाड़ी से रिमैक फील्ड पहुँचे, जहाँ कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के सैन डिएगो (यूसीएसडी) कुलपति प्रदीप खोसला ने पुनः उनका स्वागत किया। यूसीएएस के संकाय और प्रमुख सदस्य उनका परिचय प्राप्त करने हेतु पंक्तिबद्ध थे। उन्हीं के समान परम पावन ने भी विश्वविद्यालय का गाउन और टोपी पहन रखी थी। उनके मंच पर आते ही श्रोताओं की ओर से उत्साह पूर्ण अभिनन्दन किया गया। प्रारंभ समारोह राष्ट्रीय गीत के वृन्द गान प्रस्तुति से हुआ जिसके लिए सभी खड़े हुए।


कुलपति प्रदीप खोसला ने २०१७ कक्षा को बधाई देते और स्नातकों, अभिभावकों और मुख्य वक्ता का स्वागत करते हुए प्रारंभ किया। उन्होंने सभा को परम पावन का परिचय कराया, यह वर्णित करते हुए कि उनका जन्म कहाँ हुआ था और उनकी उपलब्धियों में बताते हुए और साथ ही यह भी बताया कि वे उन्हें यूसीएसडी पदक प्रदान करने वाले थे, विश्वविद्यालय का सर्वोच्च पुरस्कार। साथ में पुष्प हार और मनका की माला भी थी, पर जब उन्होंने परम पावन को यूसीएसडी ट्राइटन बेसबॉल टोपी प्रस्तुत की और उन्होंने उसे पहनी तो उत्साहित स्वर से सभा गूंज उठी।

परम पावन ने सदैव की तरह अपना संबोधन प्रारंभ किया:
 
"आदरणीय बड़े भाइयों और बहनों और मुख्य रूप से छोटे भाइयों और बहनों, इसमें प्रतिभागी होकर मैं अत्यंत खुश हूँ - मैं कमन्समेंट शब्द नहीं जानता। मैंने पहली बार १९४० के दशक में अंग्रेजी सीखना प्रारंभ किया था, पर यह अभी भी बहुत टूटी फूटी है। एक बौद्ध भिक्षु के रूप में मुझे लगा कि बुद्धत्व तक पहुंचने के लिए अंग्रेज़ी बहुत आवश्यक नहीं है और अपने बचपन से मैं एक आलसी छात्र रहा हूँ।
 
"आप जैसे युवा लोगों के साथ मिल कर मैं जानता हूँ कि आप मानवता का भविष्य हैं। और अब और यहाँ २१वीं शताब्दी के प्रारंभ में आपके पास एक बेहतर विश्व, एक सुखी विश्व के निर्माण का बनाने का बेहतर अवसर और उत्तरदायित्व है-एक विश्व जो हिंसा रहित अथवा अमीर और गरीब के बीच बड़ी खाई रहित हो। हम बड़ी उम्र वाले संभवतः इसे देखने के लिए जीवित न होंगे पर आप देख सकेंगे।


"मनुष्य सामाजिक प्राणी हैं और बहुत अधिक अन्योन्याश्रित हैं। जलवायु परिवर्तन हम सभी को धमकी देता है। यह उन प्राकृतिक चुनौतियों में से एक है जो हमें सिखाता है कि हमें एक साथ कार्य करना चाहिए, एक सामान्य लक्ष्य तक पहुँचने के लिए एक आम प्रयास करना चाहिए। एक अधिक शांतिपूर्ण विश्व और एक अधिक शांतिपूर्ण शताब्दी के लिए आवश्यक है कि हम शस्त्रों पर नहीं बल्कि एक व्यापक आंतरिक शांति विकसित करने पर निर्भर हों।
 
"आपके समर्पित अध्ययन के परिणामस्वरूप आज आप अपनी उपाधियाँ प्राप्त कर रहे हैं। मैं आपको बधाई देता हूँ। अब आपको सोचना चाहिए कि जो ज्ञान आपने प्राप्त किया है उसका उपयोग किस तरह करेंगे, दूसरों के लिए समस्याएं लाकर नहीं, बल्कि शांति बनाने हेतु। जो अंतर लाएगा वह सौहार्दता है। आपको दृढ़ संकल्प और आशावादिता, इच्छा-शक्ति और आत्मविश्वास की आवश्यकता होगी। यह मेरा अनुभव है कि दूसरों के प्रति सौहार्दतापूर्ण चिंता हमारे आत्मविश्वास को सशक्त करती है।"
 
परम पावन ने शिक्षकों की सराहना की, जिनके प्रयासों ने आज के स्नातकों की सफलता में योगदान दिया है।
 
छात्रों और शिक्षकों के बीच भारतीयों की उपस्थिति को देखकर परम पावन ने स्मरण किया कि उनका अपना प्रशिक्षण और बौद्धिक विकास प्राचीन भारतीय ज्ञान में निहित था - नालंदा परम्परा। उन्होंने टिप्पणी की कि उन्होंने हाल ही में इस प्राचीन ज्ञान को पुनर्जीवित करने के प्रयास के महत्व का अनुभव किया है। उन्होंने यह भी बताया कि छात्रों में चीनी भी हैं -ऐतिहासिक रूप से बुद्ध के अनुयायी। उन्होंने सूचित किया कि एक चीनी विश्वविद्यालय ने हाल ही में अनुमान लगाया था कि चीन में ३०० अरब से अधिक बौद्ध हैं उन्होंने सिफारिश की कि वे अपनी सांस्कृतिक विरासत पर अधिक ध्यान दें।


परम पावन ने सुझाया कि भारत और चीन में करुणा जैसे मानवीय मूल्यों को गहन करने पर भ्रष्टाचार को कम करने और अमीर और गरीबों के बीच की खाई को पाटने का प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने आगे कहा कि चित्त और भावनाओं के कार्य को समझना और तर्क का प्रयोग केवल बौद्ध अध्ययन तक सीमित नहीं था। वह एक स्वतंत्र अकादमिक दृष्टिकोण का विषय हो सकता है - एक परियोजना जिस ओर काम करने के लिए यूसीएसडी सोच सकता है।
 
"चित्त का ज्ञान आज जीवित सभी ७ अरब मनुष्यों के लिए प्रासंगिक है, क्योंकि हम अपनी भावनाओं की पूरी व्यवस्था को समझने के आधार पर अपनी विनाशकारी भावनाओं से निपटकर चित्त की शांति प्राप्त करते हैं। यह आगामी जीवन, स्वर्ग या नरक से संबंधित नहीं है बल्कि इस जीवन से यहाँ और अभी। हम ऐन्द्रिक स्तर पर सुख का अनुभव करते हैं जो कि अपेक्षाकृत अल्पकालिक है। परन्तु स्थायी सुख हमारे चित्त की स्थिति से संबंधित है। चूंकि हम चित्त सहित सचेतन प्राणी हैं, अतः उन चित्तों के कार्य कलाप को समझना आज भी उतना ही प्रासंगिक और आवश्यक है जितना अतीत में था। प्राचीन भारतीय मनोविज्ञान बहुत विकसित था और मेरा मानना ​​है कि, यह अब हमारे लिए सहायक हो सकता है। मैं आधुनिक भारतीयों को इस पर ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ क्योंकि हम प्रज्ञा और सौहार्दता के आधार पर सुखी व्यक्तियों, सुखी समुदायों और एक सुखी मानवता निर्मित कर सकते हैं। धन्यवाद।"

परम पावन के शब्दों को सौहार्दपूर्ण करतल ध्वनि से ग्रहण किया गया। उनके पश्चात एक स्नातक छात्र, रिकी फ्लैहिए ने इस स्नातक स्तर तक पहुँचने के आश्चर्य भाव के अपने अनुभव को साझा किया। उन्होंने अपने साथी ट्राइटन्स को बधाई दी और उन्हें परम पावन की सलाह, कि स्वयं से पहले दूसरों की सेवा को ध्यान में रखते हुए अपने जीवन के अगले अध्याय को लिखने के लिए प्रोत्साहित किया।

कार्यकारी उपकुलपति पीटर काउहे ने कुलपति द्वारा स्नातकों को उनकी उपाधि प्रधान करने से पहले कला और मानविकी, जैविक विज्ञान, इंजीनियरिंग, भौतिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, प्रबंधन, समुद्री विज्ञान और स्वास्थ्य विज्ञान के विभिन्न डीन्स से अनुरोध किया कि वे अपने स्नातकों को पहचाने जाने के लिए खड़े होने को कहें।

रिकी फ्लैहाइव ने झालर मोड़ने का नेतृत्व किया, कुलपति खोसला ने सम्मिलित होने के लिए पुनः परम पावन को धन्यवाद दिया और सभा बिखर गई।
 
बाद में परम पावन कैलिफ़ोर्निया सैन डिएगो विश्वविद्यालय के नेतृत्व के साथ मध्याह्न भोजन में सम्मिलित हुए। इस दौरान उनके पुराने मित्र रिचर्ड ब्लम ने उनका परिचय दिया। उन्होंने परम पावन को विगत ४५ वर्षों की मैत्री के दौरान जो प्रेरणा उन्होंने प्रदान की उसके लिए धन्यवाद दिया और खुशी जतायी कि वे ११३ वर्ष की उम्र तक जीवित रहने के लिए प्रतिबद्ध हैं। जब उऩकी स्वयं की टिप्पणी करने का अवसर आया तो परम पावन ने इसे स्पष्ट किया।


"कुछ अत्यंत अनुभूत व्यक्तियों में भविष्य को देखने की क्षमता होती है," उन्होंने कहा, "हमारी सामान्य ऐन्द्रिक चेतना जो हमारे मस्तिष्क से जुड़ी है, पर जब हम स्वप्न देखते हैं तो हमारी चेतना सूक्ष्मतर होती है। गहन निद्रा में यह और भी सूक्ष्म होती है और मृत्यु के समय सबसे सूक्ष्म चेतना प्रकट होती है।
 
"विगत ४० वर्षों में ऐसे लोगों के लगभग ३० मामले हैं, चूँकि उन्होंने सूक्ष्मतम चित्त को प्रकट किया है, वे नैदानिक ​​रूप से मृत जान पड़ते हैं पर फिर भी उनके शरीर ताजा रहते हैं। मेरे अपने शिक्षक ने इसे तेरह दिनों तक दिखाया। आधुनिक वैज्ञानिकों के पास इसके लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं है, परन्तु इसकी जांच करने के लिए एक परियोजना प्रारंभ की गई है।
 
"ऐसा कहा जाता है कि जो लोग इस सूक्ष्मतम चित्त को साक्षात करते हैं, वे भविष्य देख सकते हैं, साथ ही अपने विगत जीवनों को भी याद कर सकते हैं। लगभग २०० वर्ष पूर्व इस तरह के लामा ने भविष्यवाणी की थी कि कोई मुझ जैसे उत्तर-पूर्वी तिब्बत में जन्मा, जिस वर्ष मेरा जन्म हुआ था, वह ११३ वर्ष की आयु तक जीवित रहेगा। मुझे भी एक स्वप्न आया था जिससे ऐसा संकेत मिला जान पड़ा। परन्तु अब ऐसे लक्षण हैं, कि जहां मेरा दिमाग तेज है; मेरा शरीर अब इतना चुस्त नहीं। जो भी हो यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आप कितना लम्बा जीवन जीते हैं, बल्कि क्या आप एक सार्थक जीवन जी रहे हैं। इसका अर्थ धन और ख्याति जमा करना नहीं है, अपितु अपने साथी मनुष्यों के लिए सहायक होना है। इसका अर्थ है कि यदि आप कर सकें तो दूसरों की सहायता करें पर यदि आप ऐसा नहीं कर सकते तो कम से कम उन्हें हानि न पहुँचाएँ।"


परम पावन ने कहा कि वे प्राचीन भारतीय ज्ञान को पुनर्जीवित करने के अपने प्रयासों से प्रोत्साहित हैं और उन्हें विश्वास था कि अन्य इसे आगे बढ़ाएँगे। वैज्ञानिक चित्त की खोज में रुचि रखते हैं और कई लोग आंतरिक मूल्यों में रुचि दिखा रहे हैं। यह, उन्होंने कहा कि आशा का एक संकेत है। कुलपति खोसला ने अपने ज्ञान को साझा करने के लिए परम पावन का धन्यवाद करते हुए बैठक का समापन किया।
 
रात्रि के विश्राम के लिए जाने से पूर्व परम पावन शल्य चिकित्सा के भविष्य का केन्द्र देखने गए जहाँ उन्हें नवीनतम उपकरण और प्रक्रियाओं द्वारा शल्य चिकित्सकों के प्रशिक्षण के तकनीक दिखाए गए।
 
कल, उन्हें सैन डिएगो चिड़ियाघर की यात्रा हेतु आमंत्रित किया गया है।

 

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