प्रेस के साथ बैठक और सैन डिएगो में एक सार्वजनिक व्याख्यान

16 जून 2017

सैन डिएगो, सीए, संयुक्त राज्य अमरिका, १६ जून २०१७ - पश्चिम तट की गर्म धूप में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय सैन डिएगो के रिमैक फील्ड एरीना पहुँचने पर, यूसीएसडी के कुलपति प्रदीप खोसला ने परम पावन दलाई लामा का स्वागत किया। तत्पश्चात प्रतिष्ठित टेलीविजन पत्रकार एन करी ने उनका मीडिया के सदस्यों के साथ बैठक में अनुरक्षण किया। उन्होंने परम पावन का परिचय कराया और पूछा कि क्या वे स्वयं अपना परिचय देना चाहेंगे?


"मैं जहाँ भी जाता हूँ," परम पावन ने प्रारंभ किया, "मुझे अनुभव होता है कि मैं आप में से एक हूँ, आज जीवित सात अरब मनुष्यों में से एक। हम शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से समान हैं। जन्म से ही हम सभी एक सुखी जीवन जीना चाहते हैं और यह हमारा अधिकार है। पर मेरे कई मित्र इस दृष्टिकोण को साझा करते हैं कि जब लोगों को अधिक करुणाशील होने के लिए तैयारी करने की बात आती है - सुखी होने की एक शर्त तो हमारी वर्मान शिक्षा व्यवस्था अपर्याप्त है। एक मानव भाई के रूप में मैं लोगों को यह बताने के लिए प्रतिबद्ध हूँ कि हम सभी में प्रेम और करुणा के बीज निहित हैं। परन्तु एक चतुर मस्तिष्क होना पर्याप्त नहीं है; हमें सौहार्दता की भी आवश्यकता है।
 
"एक बौद्ध भिक्षु और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जो भारत में ५८ वर्षों से रह रहा है मेरी दूसरी प्रतिबद्धता, उन धार्मिक परम्पराओं के बीच सद्भाव और मैत्री को बढ़ावा देना है, मैंने देखा है कि उस देश में फल फूल रही हैं। तीसरा, एक तिब्बती होने के नाते और एक ऐसे व्यक्ति होने के नाते जिस पर तिब्बतियों के बहुसंख्यकों ने अपनी आस्था रखी है, मैं तिब्बत की अहिंसक संस्कृति को संरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ। इसमें चित्त और भावनाओं के प्रकार्यं का प्राचीन भारतीय ज्ञान शामिल है जिसे हमने १००० से अधिक वर्षों से संरक्षित रखा है, पर जो आज अत्यधिक प्रासंगिक है। इसके अतिरिक्त चूँकि एशिया भर में १ अरब से अधिक मनुष्य तिब्बती पठार पर जन्म लेने वाले नदियों के जल पर निर्भर हैं, मैं तिब्बत के प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा के लिए समर्पित हूँ।


"यह ध्यान में रखते हुए कि हम मनुष्य सामाजिक प्राणी हैं और यह प्रेम व स्नेह है जो हमें एक साथ लाने में सहायता करता है, जबकि क्रोध हमें अलग करता है, मैं यह सुझाव देना चाहूँगा कि आप मीडिया के सदस्यों का उत्तरदायित्व है कि आप शिक्षित करने के साथ ही, जो हो रहा है उसकी सूचना दें।"
 
पर्यावरण के बारे में एक प्रश्न के उत्तर में, परम पावन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण वैश्विक मुद्दे हैं जिन्हें एक दीर्घकालीन दृष्टिकोण से संबोधित करने की आवश्यकता है। उन्होंने अपने श्रोताओं को स्मरण कराया कि संयुक्त राज्य अमरीका व्यापक विश्व का अंग है।
 
यह पूछे जाने पर कि वैयक्तिक पीड़ा को किस तरह कुछ उपयोगी में रूपांतरित किया जाए, परम पावन ने टिप्पणी की कि यह मात्र एक गोली लेने की बात नहीं है। मानसिक प्रशिक्षण में वर्षों के प्रयास लगते हैं और इसमें हमारी नकारात्मक भावनाओं से किस तरह निपटा जाए की शिक्षा शामिल है। एक व्यक्तिगत, सामुदायिक और वैश्विक स्तर पर सौहार्दता आवश्यक है। उन्होंने तिब्बती भिक्षुओं को उद्धृत किया जो दशकों तक चीनी कारागारों में बंदी थे, जो कहते हैं कि उनके समक्ष सबसे बड़ा संकट उन लोगों के प्रति करुणा की भावना का खोना था जिन्होंने उन्हें यातना दी थी। उन्होंने संज्ञानात्मक चिकित्सक हारून बेक की अंतर्दृष्टि का उल्लेख किया कि हमारे क्रोध का ९०% मानसिक प्रक्षेपण है।


अंत में, पत्रकारों ने परम पावन से कुछ चीनी छात्रों द्वारा उनके विश्वविद्यालय की यात्रा पर आपत्ति उठाने को लेकर उनकी प्रतिक्रिया मांगी।
 
उन्होंने कहा, "यह काफी साधारण है"। "मुझे लगता है कि उन्हें ठीक से बताया नहीं गया है। उदाहरणार्थ चीनी अधिकारियों के बीच कट्टरपंथी मुझे एक राक्षस के रूप में वर्णित करते हैं और यह सभी को स्पष्ट होना चाहिए कि हाँ, मैं सींगों वाला राक्षस हूँ। वे मुझे अलगाववादी भी कहते हैं, पर फिर भी हर कोई जानता है कि १९७४ से हमने स्वतंत्रता की मांग नहीं की है। तिब्बत को आधुनिक बनाने की आवश्यकता है, हमें भौतिक विकास की आवश्यकता है और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के साथ बने रहने से हमें इस में सहायता मिल सकती है। परन्तु पहले चीन में एक नई सांस्कृतिक क्रांति की आवश्यकता है पर पहले की तरह नफरत से प्रेरित नहीं बल्कि करुणा से प्रेरित।"
 
बाहर रिमैक फील्ड पर मंच संभालते हुए यूसीएसडी के कुलपति प्रदीप खोसला धूप में धीरज से बैठे २५,००० के जनमानस से परम पावन का परिचय कराया। उन्होंने कहा, "परम पावन हमें करुणा विकसित करने और अपने आप को और अपने विश्व की समझ प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते हैं।" इसके बाद महापौर केविन फॉलकोनर आए और उन्होंने उत्साह भरे स्वर में कहा, "कि कितना बड़ा दिन था, कितने सम्मान की बात थी कि वे शांति के विश्व के सबसे महान अधिवक्ता को विविधता के विषय में बोलता सुन रहे थे, यहाँ सैन डिएगो में जो विश्व भर के लोगों के लिए घर है।" जैसे ही परम पावन मंच पर आए, महापौर फॉल्कनर ने उन्हें शहर की कुंजी प्रदान की, जिसे परम पावन ने अपने हाथों में पकड़कर सभी को दिखायी।


उन्हें संबोधन के लिए आमंत्रित करने से पूर्व, एन करी ने जनमानस से परम पावन का परिचय इस रूप में कराया कि वे न केवल आश्वस्त हैं कि यह खोज कि आधारभूत मानव प्रकृति करुणाशील है, आशा का संकेत है पर वे ऐसे हैं जो करुणा तथा अहिंसा के संदेश द्वारा दूसरे लोगों तक पहुँचते हैं।
 
परम पावन ने जनमानस को संबोधित करते हुए अपना व्याख्यान प्रारंभ किया "बड़े और छोटे भाइयों व बहनों"।
 
"मुझे औपचारिकता अच्छी नहीं लगती," उन्होंने आगे कहा, "जब हम जन्म लेते हैं तो कोई औपचारिकता नहीं होती और न ही जब हम मरते हैं। इस बीच में हमें एक दूसरे के साथ भाई और बहनों के समान पारस्परिक व्यवहार करना चाहिए क्योंकि हम सभी एक सुखी जीवन जीना चाहते हैं। यह हमारा आम उद्देश्य और हमारा अधिकार है। भविष्य के बारे में कुछ भी निश्चित नहीं है, पर हम सुखी होने की आशा में रहते हैं। पर उसी के साथ हम सब तरह की समस्याओं का सामना करते हैं, जिनमें से कई हमारी अपनी बनाई हुई हैं। क्यूँ? क्योंकि हम क्रोध और भय जैसी भावनाओं के बहकावे में आ जाते हैं। यद्यपि मेरा मानना ​​है कि हम ऐसी भावनाओं से निपटना सीख सकते हैं। और विनाशकारी भावनाओं से निपटने के लिए सबसे प्रभावी उपचार में से एक है, सभी ७ अरब मानवों की एकता के आधार पर मैत्री उत्पन्न करना। यही कारण है कि मैं आपको भाइयों और बहनों के रूप में संबोधित करता हूँ।
 
"यदि हम समझें कि हम सभी समान हैं तो हमारे बीच कोई बाधा नहीं है। तो, मैं जानबूझकर मानवता की एकता के आधार पर करुणा को बढ़ावा देने का प्रयास करता हूँ।


"मानव इतिहास में विभिन्न स्थानों पर, विभिन्न पर्यावरणों में, विभिन्न समयों पर विभिन्न समुदाय आए। विभिन्न भाषाओं और लेखन के तरीकों का जन्म हुआ। इस प्राकृतिक विविधता का परिणाम यह है कि मानवता एक उद्यान के समान है जो एक ही तरह के पुष्प से नहीं, अपितु विभिन्न प्रकार के फूलों से भरा हुआ है। परन्तु जब हम जाति, रंग, राष्ट्रीयता, आस्था, हम समृद्ध हैं या निर्धन, शिक्षित या अशिक्षित के गौण भेदों पर बहुत अधिक बल देते हैं तो हम यह भूल जाते हैं कि हम सब इंसान हैं। हमारी अपनी संस्कृति और अस्मिता को बनाए रखते हुए हमें यह स्मरण रखने की आवश्यकता है कि मानव होते हुए हम एक हैं और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियाँ हम सब को प्रभावित करती हैं और सौहार्दता पर केन्द्रित होने की आवश्यकता है।
 
"करुणा चित्त की शांति लाता है। यह हमारे मुख पर एक मुस्कुराहट लाती है और वास्तविक मुस्कान हमें और निकट लाती है। आज शिक्षा की आवश्यकता न केवल अपनी बुद्धि का विकास करने की है, बल्कि सौहार्दता और करुणा के आधारभूत मानवीय मूल्यों का समर्थन करना भी है। ये गुण धर्म तक सीमिति नहीं हैं, क्योंकि मानव के रूप में हम सभी चित्त की शांति चाहते हैं। और यदि हम स्मरण रखें कि वे भी हम जैसे इंसान हैं तो हम उन लोगों के प्रति भी दयालुता का भाव रख सकते हैं, जिन्हें हम शत्रु मानते हैं।"


ऐन करी द्वारा पढ़े गए श्रोताओं के कई प्रश्नों में से पहला एक ९३ वर्षीय महिला का था जिसकी पोती कल स्नातक उपाधि प्राप्त करेगी। वह जानना चाहती थी कि परम पावन उसे विश्व को एक बेहतर स्थान बनाने के लिए क्या परामर्श देंगे। अपने उत्तर में उन्होंने सुझाया कि २०वीं शताब्दी की प्रवृत्ति समस्याओं के समाधान हेतु बल का प्रयोग था। उन्होंने कहा कि यह एक भूल थी और यदि हम २१वीं शताब्दी को शांति की अवधि बनाना चाहते हैं तो हमें इसके स्थान पर संवाद के माध्यम से समस्याओं को सुलझाने की आवश्यकता है।
 
"हमें अपनी बुद्धि का उपयोग करने की आवश्यकता है, चूँकि हम सभी अन्योन्याश्रित हैं, दूसरों के हित हमारे स्वयं के हैं। हमें अधिक समग्र दृष्टिकोण लेने की जरूरत है।"
 
उन्होंने कहा कि उदाहरण के लिए, कठोर शब्दों का प्रयोग कर एक विभाजक प्रवृत्ति अपनाना संकीर्ण मनोवृत्ति का प्रतिबिंब है। सुखी और आनन्दित होने के लिए हमें मित्रों की आवश्यकता है। मैत्री विश्वास पर आधारित है और विश्वास निर्भर करता है कि हम किस तरह दूसरों के साथ दया का व्यवहार करते हैं।
 
यह पूछे जाने पर कि वह सबसे अधिक किसके प्रशंसक हैं, परम पावन ने महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग जूनियर और आज जीवित लोगों में बिशप डेसमंड टूटु का उल्लेख किया। इस पर कि उन्होंने इस जीवन में क्या सीखा है, तो परम पावन ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने सर्वप्रथम अपनी माँ से प्यार और स्नेह के बारे में सीखा था। पर उन्होंने कहा कि १९५९ में शरणार्थी बनने के बाद उन्हें इतने विभिन्न प्रकार के लोगों से मिलने और उन्हें जानने के इतने सारे अवसर मिले, विशेष रूप से वैज्ञानिकों से। परिणामस्वरूप वह अब स्वयं को आधे बौद्ध भिक्षु और आधे वैज्ञानिक मानते हैं। उन्होंने बल देते हुए कि तिब्बत में हुई त्रासदी उनके लिए अन्य अवसर लेकर आई, इसलिए उन्होंने सीखा कि कुछ भी बिल्कुल नकारात्मक नहीं होता।
 
परम पावन ने समाप्त करते हुए कहा कि चीजें चमत्कारों के परिणामस्वरूप नहीं होतीं, अपितु दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास के साथ प्रयास करने और आंतरिक शक्ति को काम में लाने से होती हैं। अपनी बात सुनने के लिए उन्होंने दर्शकों को धन्यवाद दिया और जो कुछ उन्होंने कहा उस पर विचार करने के लिए कहा, विशेष रूप से भविष्य जो हमारे लिए लेकर आएगा वह इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या कार्य करते हैं।

मद्याह्न भोजनोपरांत कुलपति के निवास स्थल गेईज़ेल हाउस में कैलिफोर्निया के सैन डिएगो विश्वविद्यालय के समर्थकों के साथ बातचीत करने के लिए आमंत्रित किए जाने पर कैलिफोर्निया विधायिका के पूर्व अध्यक्ष जॉन पेरेज़ ने वहाँ एकत्रित १३० लोगों से परम पावन का परिचय कराया। परम पावन ने पुनः उनकी सुख के स्रोत के रूप में मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देने, अंतर्धार्मिक मैत्री और सामंजस्य को प्रोत्साहित करने और न केवल तिब्बत के ज्ञान और संस्कृति, बल्कि इसके प्राकृतिक वातावरण को भी संरक्षित करने की अपनी तीन प्रतिबद्धताओं को संक्षेप रूप से बताते हुए प्रारंभ किया। उन्होंने कहा कि तिब्बतियों ने १००० से अधिक वर्षों से प्राचीन भारतीय ज्ञान को जीवित रखा है, विशेष रूप से चित्त और भावनाओं के प्रकार्य के विषय में।
 
यह पूछे जाने पर कि वह क्या खाते हैं, परम पावन ने समझाया कि बौद्ध भिक्षुओं के लिए परम्परागत प्रथा भिक्षाटन है। उन्होंने थाईलैंड में भिक्षुओं के साथ ऐसा करने का उल्लेख किया। परिणाम यह होता है कि आपको जो कुछ भी दिया गया है उसे यह अथवा वह किसी विकल्प के बिना स्वीकार कर लें।

एक न्यूरोसाइंस्टिस्ट के प्रश्न कि बच्चों में जागरूकता बनाए रखने के लिए उन्हें किस तरह प्रोत्साहित किया जाए, के उत्तर में परम पावन ने सलाह दी कि 'शमथ' के अभ्यास का प्रभाव स्मृति में सुधार है, जबकि 'विपश्यना' या विशेष अंतर्दृष्टि ध्यान चित्त को प्रखर करती है।
 
एक और प्रश्नकर्ता जानना चाहता था कि यदि कोई पन्द्रहवें दलाई लामा न हो तो क्या फिर भी परम पावन उपस्थित रहेंगे और उन्होंने अपनी प्रार्थना दोहराई -
 
जब तक आकाश है स्थित
जब तक हैं स्थित सत्व यहाँ
तक तक बना रहूँ मैं भी
और संसार के दुख कर सकूँ दूर

 

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