दोलज्ञेल (शुगदेन)

दोलज्ञेल (शुगदेन) के संबंध में परम पावन दलाई लामा की सलाह

एक लंबी तथा सावधानी से की गई जाँच के बाद परम पावन दलाई लामा प्रबल रूप से तिब्बतियो को भयंकर देव दोलज्ञेल (शुगदेन) की पूजा न करने की सलाह दे रहे हैं। यद्यपि एक समय वे स्वयं दोलज्ञेल का आराधना करते थे, पर 1975 में परम पावन ने इसके गहन ऐतिहासिक, सामाजिक तथा धार्मिक समस्याओं की खोज के बाद इस अभ्यास का त्याग कर दिया। उन्होंने ऐसा अपने कनिष्ठ शिक्षक स्वर्गीय क्याब्जे ठीजंग रिनपोछे की पूरी जानकारी से किया, जिनके साथ परम पावन पहली बार इस आराधना से जुड़े थे। गेलुग तथा सक्या सम्प्रदाय – तिब्बती बौद्ध परम्परा, जिसमें अधिकांश दोलज्ञेल पूजक वाले शामिल हैं – इसके पूरे इतिहास में इस आत्मा का आराधना विवादास्पद रहा है। ऐतिहासिक जाँच से पता चलता है कि शुगदेन आराधना, जिसमें प्रबल साम्प्रदायिक स्वर सुनाई पड़ते हैं, का तिब्बत के विभिन्न भागों और तिब्बत के विभिन्न समुदायों के बीच साम्प्रदायिक असमन्वय  वातावरण फैलाने का एक इतिहास है। अतः 1975 से परम पावन ने समय समय पर सार्वजनिक रूप से अपने विचार लोगों के सामने रखे हैं कि निम्नलिखित तीन कारणों के चलते  यह आराधना अनुचित है -

1    तिब्बती बौद्ध धर्म का एक प्रकार की प्रेतात्मा की पूजा के रूप में पतन का खतरा - मूल रूप से तिब्बती बौद्ध धर्म का विकास भारत के महान श्रमण विश्वविद्यालय नालंदा द्वारा स्थापित एक सच्चे और  प्राचीन परम्परा से हुआ, एक ऐसी परम्परा जिसे परम पावन प्रायः बौद्ध धर्म का समग्र रूप कहते हैं। यह बुद्ध की मूल शिक्षाओं का साकार रूप है जो महान बौद्ध गुरुओं जैसे नागार्जुन, असंग, वसुबंधु, दिगनाग और धर्मकीर्ति के दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक अनुभूतियों से विकसित हुआ। चूँकि तिब्बत में 8वीं सदी के प्रारंभ में ही बौद्ध धर्म की स्थापना करने में महान दार्शनिक और तर्कशास्त्री शान्तरक्षित की बड़ी भूमिका थी अतः दार्शनिक जाँच और तार्किक विश्लेषण तिब्बती बौद्ध धर्म के सदा से ही प्रमाण चिह्न रहे हैं। दोलज्ञेल आराधना के साथ समस्या यह है कि यह आत्मा दोलज्ञेल (शुगदेन) को एक धर्म रक्षक के रूप में प्रस्तुत करती है और इससे भी अधिक यह कि यह आराधना इस आत्मा को बुद्ध से भी अधिक महत्त्वपूर्ण रूप में प्रस्तुत करता है। यदि इस प्रथा को समय रहते न रोका गया और भोले भाले लोग इस प्रकार के पंथ आराधना की ओर आकर्षित होते गए तो खतरा है कि तिब्बती बौद्ध धर्म की सम्पन्न परम्परा केवल आत्माओं की आराधना करते हुए पतित हो जाएगी।

2    एक उभरती सच्ची गैर साम्प्रदायिकता में बाधा - परम पावन ने अकसर कहा है कि उनकी प्रतिबद्धताओं में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतिबद्धता अंतर्धर्मीय समझ तथा समरसता को बढ़ावा देना है। इस प्रयास के अंतर्गत, परम पावन तिब्बती बौद्ध धर्म की सभी परम्पराओं में गैर साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। ऐसा करते हुए परम पावन अपने पूर्ववर्ती गुरुओं के उदाहरण का पालन कर रहे हैं, विशेषकर पाँचवें दलाई लामा और तेरहवें दलाई लामा। यह गैर साम्प्रदायिक दृष्टिकोण न केवल सभी तिब्बती परम्पराओं को आपसी रूप से समृद्ध कराएगा पर यह उभरते साम्प्रदायिकता जिससे तिब्बती परम्परा पर अहितकारी परिणाम पड़ सकता है, के विरुद्ध बचाव का सर्वश्रेष्ठ रूप होगा। दोलज्ञेल पूजा तथा साम्प्रदायिकता के मान्य संबंध को ध्यान में रखते हुए यह आराधना तिब्बती बौद्ध परंपरा में सच्चे गैर साम्प्रदायिकता की भावना का पोषण करने में मूल रूप से बाधक है।

3    विशेषकर तिब्बती समाज की भलाई के संदर्भ में अनुचित - तिब्बती लोगों की आज की कठिन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दोलज्ञेल की पूजा करना खासकर कष्टदायी है। ग्रंथों और ऐतिहासिक खोज से पता चला है कि दोलज्ञेल आत्मा महान पाँचवें दलाई लामा तथा उनकी सरकार के विरोध में उत्पन्न हुई। पाँचवें दलाई लामा, जिन्होंने 17वीं शताब्दी में तिब्बत का आध्यात्मिक तथा लौकिक नेतृत्व संभाला, ने स्वयं दोलज्ञेल का एक दुरात्मा के रूप में खंडन किया जो दुर्नियोजित उद्देश्य से उत्पन्न हुई है और साधारणतया लोगों के कल्याण के लिए और विशिष्ट रूप से दलाई लामा द्वारा नेतृत्व किए जा रहे सरकार के लिए विनाशकारी है। तेरहवें दलाई लामा और अन्य तिब्बती आध्यात्मिक गुरुओं ने भी बड़े प्रबलता से इस आराधना के विरोध में अपनी आवाज़ उठाई  है। इसलिए सम्प्रति तिब्बती संदर्भ में, जहाँ तिब्बती लोगों के बीच एकता अत्यावश्यक है, इस प्रकार के विवादास्पद और विभाजित करने वाली पूजा का प्रचलन अनुचित है।

परम पावन ने अपने अनुयायियों से आग्रह किया है कि वे इन तीन कारणों के आधार पर सावधानी से दोलज्ञेल आराधना की समस्याओं के विषय में सोचें और उसके अनुसार आचरण करें। उनका कथन है कि एक बौद्ध नेता होने के नाते, और साथ ही तिब्बती लोगों के लिए खास चिंता रखते हुए, यह उनका उत्तरदायित्व है कि वह ऐसे आत्माओं की पूजा के दुष्परिणामों के बारे में बोलें। फिर चाहे उनकी सलाह कोई माने अथवा न माने, परम पावन ने स्पष्ट कर दिया है कि यह व्यक्ति को निश्चित करना है। पर चूँकि उनकी अपनी प्रबल मान्यता है कि यह आराधना कितना नकारात्मक है, उन्होंने प्रार्थना की है कि जो दोलज्ञेल पूजा जारी रखे हैं वे उनके औपचारिक धर्म प्रवचनों में भाग न लें, जिसमें पारम्परिक रूप से एक गुरु शिष्य संबंध स्थापित करने की आवश्यकता होती है।

 

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