आध्यात्मिकता और प्रकृति

मुझे लगता है कि आप यहाँ कुछ आशा लेकर आए थे पर मूल तौर पर मेरे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है। केवल सरल रूप में मैं अपने अनुभव और मेरे विचार आपके साथ बाँटने का प्रयास करूँगा। देखिए ग्रह की देखभाल करने में कुछ विशिष्ट, कुछ पवित्र नहीं है। यह कुछ अपने स्वयं के घर की देखभाल जैसा है। इसके अतिरिक्त हमारे पास कोई और ग्रह अथवा मकान नहीं है। यद्यपि बहुत अधिक अशांति और समस्याएँ हैं  पर यह हमारा एकमात्र विकल्प है। हम दूसरे ग्रहों को नहीं जा सकते। उदाहरणार्थ चाँद को लें, चाँद दूर से बहुत सुंदर दिखता, प्रतीत होता है, पर यदि आप वहाँ जाएँ और रहने लगें तो वह भयानक होगा। मैं ऐसा सोचता हूँ। तो आप देखें कि हमारा नीला ग्रह अधिक बेहतर और सुखी है। इसलिए हमें अपने स्वयं के स्थान या घर या ग्रह का ध्यान रखना चाहिए।


आखिरकार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मैं प्रायः अपने मित्रों से कहता हूँ कि उन्हें दर्शनशास्त्र, ऐसे पेशेवर और जटिल विषयों के अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं है। केवल इन भोले पशुओं, कीटों, चीटियों, मधुमक्खियों आदि की ओर देखकर अधिकांश बार मेरे मन में उनके प्रति एक प्रकार का सम्मान आ जाता है। कैसे? क्योंकि उनका कोई धर्म, कोई संविधान, कोई पुलिस बल नहीं है, कुछ भी नहीं पर वे प्रकृति के अस्तित्व के नियमों अथवा या प्रकृति के नियमों या प्रणाली को मानते हुए सद्भावना से रहते हैं।

हम मनुष्यों के साथ आखिर क्या गड़बड़ है? हम मनुष्यों के पास ऐसी बुद्धि और मानवीय प्रज्ञा है। मैं सोचता हूँ कि हम प्रायः मानवीय प्रज्ञा का उपाय गलत तरीके से या गलत दिशा में करते हैं। इसके परिणाम स्वरूप कि हम कुछ ऐसे कार्य कर रहे हैं जो हमारे मूल मानवीय स्वभाव के विपरीत हैं।

एक दृष्टिकोण से तो धर्म थोड़ी बहुत आराम की वस्तु है। अगर आपका कोई धर्म है तो बहुत अच्छी बात है, वैसे बिना धर्म के भी आप जीवित रह सकते हैं और अपना जीवन-बसर कर सकते हैं, परन्तु मानव प्रेम के बिना हम जीवित नहीं रह सकते।


यद्यपि क्रोध तथा घृणा, करुणा और प्रेम की तरह हमारे चित्त का एक अंग है, पर फिर भी मेरा यह विश्वास है कि हमारे चित्त की प्रमुख शक्ति करुणा और मानवीय स्नेह है। इसलिए साधारणतया मैं इन मानवीय गुणों को आध्यात्मिकता कहकर पुकारता हूँ। आवश्यक रूप से किसी धार्मिक संदेश और धर्म के उस अर्थ में नहीं। विज्ञान और तकनीक मानवीय स्नेह के साथ मिलकर रचनात्मक होगा। विज्ञान और तकनीक घृणा के नियंत्रण में विध्वंसक होगा।

अगर हम धर्म का अभ्यास उचित रूप से अथवा सही अर्थों में करें तो धर्म कोई बाहरी वस्तु नहीं बल्कि हमारे हृदयों में है। किसी भी धर्म का मूल अच्छा हृदय है।  कई बार मैं प्रेम और करुणा को एक वैश्विक धर्म की संज्ञा देता हूँ। यह मेरा धर्म है। जटिल दर्शन, ये या वो, कई बार अधिक कठिनाइयों और समस्याओं को जन्म देते हैं। यदि ये जटिल दर्शन एक अच्छे हृदय के विकास में लाभदायी हैं तो अच्छा है, उनका पूरा उपयोग करें। पर यदि ये जटिल दर्शन और प्रणालियाँ एक अच्छे हृदय के विकास में बाधक बनें तो उन्हें छोड़ना ही बेहतर होगा। ऐसा मेरा सोचना है ।


अगर हम मनुष्य स्वभाव को पास से देखें तो स्नेह एक अच्छे दिल की कुंजी है। मैं सोचता हूं कि माँ करुणा का प्रतीक है। प्रत्येक के पास एक अच्छे हृदय का बीज होता है। केवल इतना ही है कि क्या हम करुणा का ध्यान रखते और इसके मूल्य का अनुभव करते हैं अथवा नहीं।


(चार दिवसीय धर्म और पर्यावरण पर दुनियावी मिडलबरी सिम्पोजियम में १४ सितंबर, १९९० को दिया गया सम्बोधन, मिडलबरी कॉलेज, वेरमोंट, संयुक्त राष्ट्र अमरिका)

 

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