बौद्ध धर्म और साहित्य पर प्रथम अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन

१५ फरवरी, २००१ - शाक्यमुनि बुद्ध ने दो ​​हजार वर्ष से अधिक पहले प्रबुद्धता प्राप्त की और भारत में शिक्षा दी पर आज भी उनकी शिक्षा ताज़ा और प्रासंगिक बनी हुई है। हम चाहें जो भी हों अथवा जहाँ भी रहे हम सभी सुख चाहते हैं और दुख नहीं चाहते। बुद्ध ने सुझाया कि दुख को दूर करने के कार्य में हमें यथासंभव दूसरों की सहायता करनी चाहिए। उन्होंने आगे सलाह दी कि यदि हम वास्तव में सहायता नहीं कर सकते तो हमें कम से कम किसी को हानि न पहुँचाने के प्रति सावधान रहना चाहिए।
 
बौद्ध अभ्यास के एक भाग में ध्यान के माध्यम से हमारे चित्त का शोधन शामिल है। पर यदि अपने चित्त को शांत करने हेतु प्रेम, करुणा, उदारता और धैर्य जैसे गुणों के विकास को प्रभावशाली बनना है तो उन्हें हमें अपने दैनिक जीवन में अमल में लाना होगा। अपने स्वयं के दुख को लेकर चिंतित होने के स्थान पर दूसरों के दुख को लेकर चिंतित होना बौद्ध धर्म सहित सभी महान धर्मों की भावना का सही अर्थों में पालन करना है।
 
बौद्ध धर्म का उद्देश्य मनुष्य सहित सभी सत्वों की सेवा करना और उनका लाभ करना है। और इसलिए यह अधिक महत्त्वपूर्ण है कि हम बौद्ध यह सोचें कि अपने विचारों के साथ मानव समाज को क्या योगदान दे सकते हैं इसके बजाय कि हम अन्य लोगों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित करें। बुद्ध ने निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा कर हमें संतोष और सहिष्णुता का एक उदाहरण दिया।
 
मुझसे प्रायः प्रश्न किया जाता है कि क्या बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ और तकनीक वर्तमान समय और काल में कोई प्रासंगिकता रखती है। सभी धर्मों की तरह, बौद्ध धर्म मानव की आधारभूत समस्याओं से संबंध रखता है। जब तक हम नश्वरता, आसक्ति और मिथ्यादृष्टि से उत्पन्न आधारभूत मानव दुखों का अनुभव करते रहते हैं, उसकी प्रासंगिकता का प्रश्न ही नहीं है। कुंजी आंतरिक शांति है। यदि हममें वह है तो हम कठिनाइयों का सामना शांति और कारण के साथ कर सकते हैं। प्रेम, दया और सहिष्णुता, अहिंसा का आचरण और विशेषकर बौद्ध सिद्धांत कि सब वस्तुएँ सापेक्षिक हैं उस आंतरिक शांति का स्रोत हैं।
 
मैं यह जानकर प्रसन्न हूँ कि बौद्ध धर्म और साहित्य पर पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित किया जा रहा है। मैं इस अवसर का स्वागत करता हूँ जो उन पुस्तकों की ओर ध्यान आकर्षित करेगा जो कि प्रेम, करुणा और सार्वभौमिक उत्तरदायित्व की महान शिक्षाएँ, ऐसे मुख्य विषय जो विश्व की पवित्र परम्पराओं के आधार हैं, को प्रकट करते हैं। मेरी प्रार्थना है कि जो विभिन्न कार्यक्रम और आयोजन होंगे उनसे प्रतिभागी शांतिपूर्ण प्रेरणा प्राप्त करें।

 

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